नया ही चाहिए कोई बहाना. तभी फिर मानता है ये ज़माना. परिंदों का हैपहला हक़ गगन पर, हवा में देख कर गोली चलाना. दरो दीवार खिड़की बन्द कर के, किसी के राज़ से पर्दा उठाना. सृजन
होगा वहाँ हर हल में बस, जहाँ
मिट्टी वहां गुठली गिराना. यहाँ आँसू के कुछ कतरे गिरे थे, यहीं होगा मुहब्बत का ठिकाना. लहर ले जाएगी मिट्टी बहा कर, किनारों पर संभल कर घर बनाना. न करना ज़िक्र सपनों का किसी से, बहुत आसान है सपने चुराना.