कहाँ से आई कहाँ
चूम के गई झट से
शरारती सी थी
तितली निकल गई ख़ट से
हसीन शोख़ निगाहों
में कुछ इशारा था
न जाने कौन से पल
आँख दब गई पट से
ज़मीं पे आग के
झरने दिखाई देते हैं
गिरी है बूँद सुलगती हुयी तेरी लट से
डरा हुआ सा शहर
है, डरे हुए पंछी
डरा हुआ सा में
खुद भी हूँ अपनी आहट से
लगे थे सब तो
छुडाने में हाथ पर बिटिया
ज़रूरतों में
बुढापे की ले गई हट से
नहीं थे सेर, सवा
सेर से, मिले अब तक
उड़े जो हाथ के
तोते समझ गए चट से
न जाने कौन थी, रिश्ता
था क्या मेरा, फिर भी
थमा गई थी वो ख़त
हाथ में मेरे फट से