स्वप्न मेरे: दुःख
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

सिरा सुख दुःख का ...


दुःख नहीं होगा तो क्या जी सकेंगे ...

खिलती हुई धूप के दुबारा आने की उमंग
स्याह रात को दिन के लील लेने के बाद जागती है

सर्दी के इंतज़ार में देवदार के ठूंठ न सूखें
तो बर्फ की सफ़ेद चादर तले प्रेम के अंकुर नहीं फूटते

काले बादल के ढेर कड़कते हुए न गरजें
तो बेमानी सावन बरसते हुए भी भिगो नहीं पाता

मिलन के ठीक एक लम्हा पहले बिछड़ने की याद
बे-मौसम खिला देती हैं फूल
पंछी भी गाने लगते हैं गीत

सच बताना क्या सुख का एहसास दुःख से नहीं ...
सुख का एक सिरा दुःख का दूसरा सिरा नहीं ...?

सोमवार, 12 सितंबर 2016

क्यों खड़े कर दिए मकाँ इतने ...

दिख रहे ज़ुल्म के निशाँ इतने
लोग फिर भी हैं बे-जुबां इतने

एक प्याऊ है बूढ़े बाबा का
लोग झुकते हैं क्यों वहाँ इतने

सुख का साया न दुःख के बादल हैं
पार कर आए हैं जहाँ इतने

घूम के लौटती हैं ये सडकें
जा रहे फिर भी कारवाँ इतने

माँ मेरे साथ साथ रहती है
किसको मिलते हैं आसमाँ इतने

दिल किसी का धड़क नहीं पाया
पत्थरों के थे आशियाँ इतने

ख़ाक तो ख़ाक में ही मिलनी है
क्यों खड़े कर दिए मकाँ इतने