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मंगलवार, 22 दिसंबर 2020
सोमवार, 3 अप्रैल 2017
चाहत उम्मीद की ...
सोचता हूँ फज़ूल है उम्मीद की चाह रखना ... कई बार गहरा दर्द
दे जाती हैं ... टुकड़ा टुकड़ा मौत से अच्छा है
खुदकशी कर लेना ...
कुछ आहटें आती है उम्मीद की उस रास्ते से
छोड़ आए थे सपनों के सतरंगी ढेर जहां
आशाओं के रेशमी पाँव रहने दो पालने में
की ज़मीन नहीं मिल पायगी तुम्हारी दहलीज़ की
लटके रहेंगे हवा में
लटका रहता है खुले आसमान तले जैसे चाँद
मत देना सांस उम्मीद को
छोटी पड़ जाती है उम्र की पगडण्डी
ओर बंद नहीं होता डाली पे फूल खिलना
फज़ूल जाती हैं पतझड़ की तमाम कोशिशें
बारहा लहलहाते हैं उम्मीद के पत्ते
छुपा लेना उंगली का वो सिरा
झिलमिलाती है जहां से बर्क उम्मीद की
आँखें पी लेती हैं तरंगें शराब की तरह
नशा है जो उम्र भर नहीं उतरता
मत छोड़ना नमी जलती आग के गिर्द
भाप बनने से पहले ले लेते हैं पनाह उम्मीद के लपकते शोले
मजबूत होती रहती हैं जड़ें उम्मीद की
हालांकि खोद डाली है गहरी खाई उस रास्ते के इस ओर मैंने
जहां से होकर आता है लाव-लश्कर उम्मीद का
पर क्या करूं इस दिल का
जो छोड़ना नहीं चाहता दामन उम्मीद का ...
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