अनसुनी कर के जो हम वक़्त
को टाले जाते.
घर से जाते न तो चुपचाप
निकाले जाते.
ये तो बस आपने पहचान लिया
था वरना,
दर्द तो दूर न ये पाँव के
छाले जाते.
शुक्र है वक़्त पे बरसात ने
रख ली इज़्ज़त,
देर तक अश्क़ न पलकों में
सम्भाले जाते.
मौंके पर डँसना जो मंज़ूर न
होता उनको,
आस्तीनों में कभी सांप न
पाले जाते.
चंद यादें जो परेशान किया
करती हैं,
बस में होता जो हमारे तो उठा
ले जाते.
आईना बन के हक़ीक़त न
दिखाते सब को,
हम भी बदनाम रिसालों में उछाले
जाते.
हमको हर सच की तरफ़ डट के
खड़ा रहना था,
हो न तलवार तो हम ढाल में
ढाले जाते.
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शनिवार, 18 दिसंबर 2021
हो न तलवार तो हम ढाल में ढाले जाते ...
मंगलवार, 7 दिसंबर 2021
लगता है अपने आप के हम भी नहीं रहे ...
ईमान, धर्म, कौल, भरोसा, यकीं रहे.
मेरे भी दिल में, तेरे भी दिल में कहीं रहे.
हर-सू हो
पुर-सुकून, महकती हो रह-गुज़र,
चादर हो आसमां की
बिस्तर ज़मीं रहे.
गम हो के
धूप-छाँव, पशेमान ज़िन्दगी,
होठों पे
मुस्कुराहटें दिल में नमीं रहे.
चिंगारियाँ
सुलगने लगी हैं दबी-दबी,
कह दो हवा से आज
जहाँ है वहीँ रहे.
रिश्तों की आढ़ ले
के किसी को न बाँधना,
दिल में तमाम
उम्र रहे, वो कहीं रहे.
परवरदिगार हमको
अता कर सलाहियत,
सर पर तेरे यकीन
की चादर तनीं रहे.
एक-एक कर के छीन
लिया मुझसे सब मेरा,
लगता है अपने आप
के हम भी नहीं रहे.
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