स्वप्न मेरे: #दिगम्बर_की _ग़ज़लें
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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

हो न तलवार तो हम ढाल में ढाले जाते ...

अनसुनी कर के जो हम वक़्त को टाले जाते.
घर से जाते न तो चुपचाप निकाले जाते.

ये तो बस आपने पहचान लिया था वरना,
दर्द तो दूर न ये पाँव के छाले जाते.

शुक्र है वक़्त पे बरसात ने रख ली इज़्ज़त,
देर तक अश्क़ न पलकों में सम्भाले जाते.

मौंके पर डँसना जो मंज़ूर न होता उनको,
आस्तीनों में कभी सांप न पाले जाते.

चंद यादें जो परेशान किया करती हैं,
बस में होता जो हमारे तो उठा ले जाते.

आईना बन के हक़ीक़त न दिखाते सब को,
हम भी बदनाम रिसालों में उछाले जाते.

हमको हर सच की तरफ़ डट के खड़ा रहना था,
हो न तलवार तो हम ढाल में ढाले जाते.


मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

लगता है अपने आप के हम भी नहीं रहे ...

ईमान, धर्म, कौल, भरोसा, यकीं रहे.
मेरे भी दिल में, तेरे भी दिल में कहीं रहे.
 
हर-सू हो पुर-सुकून, महकती हो रह-गुज़र,
चादर हो आसमां की बिस्तर ज़मीं रहे.
 
गम हो के धूप-छाँव, पशेमान ज़िन्दगी,
होठों पे मुस्कुराहटें दिल में नमीं रहे.
 
चिंगारियाँ सुलगने लगी हैं दबी-दबी,
कह दो हवा से आज जहाँ है वहीँ रहे.
 
रिश्तों की आढ़ ले के किसी को न बाँधना,
दिल में तमाम उम्र रहे, वो कहीं रहे.
 
परवरदिगार हमको अता कर सलाहियत,
सर पर तेरे यकीन की चादर तनीं रहे.
 
एक-एक कर के छीन लिया मुझसे सब मेरा,
लगता है अपने आप के हम भी नहीं रहे.