स्वप्न मेरे: माँ …

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

माँ …

आज माँ को गए 14 वर्ष हो गए, फिर भी अनेकों  बार रोज़ की बातचीत में माँ का ज़िक्र हमेशा रहता है, सच कहते है लोग, माँ आस-पास ही रहती है हमेशा … एक दिन तो बस ईश्वर तय करता है उन यादों को दोहराने के लिए. समय के साथ उम्र पक रही है और शिद्दत के साथ उसकी कमी भी महसूस हो रही है ...


तभी तो राह में ठंडी सी कुछ हवाएँ रहीं,

निकलते वक़्त मेरी माँ की कुछ दुआएँ रहीं.


ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,

हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रहीं.


शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,

क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.


न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई है माँ ने,

खरा ही उतरा हूँ जो भी अपेक्षाएँ रहीं.


गुज़रती उम्र का कोई असर रहा होगा,

की माँ के पर्स में ठूँसी हुई दवाएँ रहीं.


बड़ी हुई है वो जब से मैं डाँट खाता हूँ,

की माँ के जैसी ही बेटी में कुछ अदाएँ रहीं.


कहूँ में किस को मेरे दिल को कौन समझेगा,

अधूरी दिल में जो दो चार कामनाएँ रहीं.

6 टिप्‍पणियां:

  1. माँ को कोई कैसे भूल सकता है, जब माँ के होने से उसका होना है

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  2.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार  26 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  3. माँ की प्रार्थना रास्ते आसान कर ही देती है
    शानदार

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  4. राम राम जी, आज कई साल बाद ब्लॉग पर घूम रहा था आपका ब्लॉग दिखाई दिया, दो चार ब्लोगर ही ऐसे दिखे जो 2010 -12 में लिख रहे थे और आज भी लिख रहे है! आपका समर्पण माँ के प्रति तब भी ऐसे ही था जैसे आज देखा! नमन है!

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है