तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.
मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.
कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,
हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे.
आसान आसमान पे उनको है टाँकना,
पर ये बताओ चाँद को कब तक हटाओगे.
पूरा करो के तोड़ दो कोशिश तो पर करो,
वादा किया है खुद से तो कब तक निभाओगे.
उतरो के दो-दो हाथ समुंदर से भी करो,
चप्पू बताओ रेत में कब तक चलाओगे.
इज़हार अपना इश्क़ न करने में देर हो,
दिन-रात उनकी याद में वरना बिताओगे.
पहचानी रह-गुजर पे भी मंज़िल का है पता,
सम्मान होगा राह जो अपनी बनाओगे.
नाक़ामियों से उलझे रहोगे जो देर तक,
तुम क़द को कैसे अपने शिखर तक उठाओगे.
खुल कर तो बात बोलना अब तक न आ सका,
दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे.
वाह लाजवाब
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंजब कोई यूँ पूछेगा ... उत्तर क्या मौन रहेगा ?
जवाब देंहटाएंशानदार रचना
वाह!! ज़िंदगी से जुड़े खूबसूरत अश्यार
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जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 1 जुलाई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
वाह !! लाजवाब सृजन ..,अति सुन्दर ।
जवाब देंहटाएंवाह बेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंआपकी यह ग़ज़ल 'इश्क़ की रुमानियत' और 'ज़िंदगी के फलसफे' का एक बेहतरीन संतुलन है। भाषा सरल लेकिन मायने बहुत गहरे, जैसे-'रेत में चप्पू चलाना', 'धूप का लिबास' और 'आसमान पर टाँकना' जैसे प्रयोग आपकी कल्पनाशीलता को बहुत ऊँचे दर्जे पर ले जाती है, जो बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हुए सीधे दिल को छूती है।
जवाब देंहटाएंनाक़ामियों से उलझे रहोगे जो देर तक,
जवाब देंहटाएंतुम क़द को कैसे अपने शिखर तक उठाओगे.
वाह!!!
हर शेर चिंतनपरक
बहुत ही लाजवाब🙏🙏