स्वप्न मेरे: छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान ...

शनिवार, 6 जून 2026

छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान ...

हम क्यों हुए हैं इश्क़ में गिर कर लहुलुहान.
अब तक हुवे नहीं जो सितमगर लहुलुहान.

कुछ प्रश्न, प्रश्न तक ही रहे तब ही ठीक है,
कर देंगें वर्ना उनके ये उत्तर लहुलुहान.

यादों के तिनके पैर में कुछ इस क़दर गढ़े,
जूतों के बीच पाँव हैं दिन भर लहुलुहान.

एहसास दो-पहर का है सुबहा के नो बजे,
गर्मी में आफ़ताब है अक्सर लहुलुहान.

कुछ यूँ शबे फिराक़ में आहें दहक उठीं,
तकिया, रज़ाई, सिलवटें, बिस्तर, लहुलुहान.

रुखसत हो आफ़ताब, के आमद हो चाँद की,
हर शाम ही हुआ है समुन्दर लहुलुहान.

ज़ुल्मों सितम की हद को न पूछो तो ठीक है,
छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान.

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