हम क्यों हुए हैं इश्क़ में गिर कर लहुलुहान.
अब तक हुवे नहीं जो सितमगर लहुलुहान.
कुछ प्रश्न, प्रश्न तक ही रहे तब ही ठीक है,
कर देंगें वर्ना उनके ये उत्तर लहुलुहान.
यादों के तिनके पैर में कुछ इस क़दर गढ़े,
जूतों के बीच पाँव हैं दिन भर लहुलुहान.
एहसास दो-पहर का है सुबहा के नो बजे,
गर्मी में आफ़ताब है अक्सर लहुलुहान.
कुछ यूँ शबे फिराक़ में आहें दहक उठीं,
तकिया, रज़ाई, सिलवटें, बिस्तर, लहुलुहान.
रुखसत हो आफ़ताब, के आमद हो चाँद की,
हर शाम ही हुआ है समुन्दर लहुलुहान.
ज़ुल्मों सितम की हद को न पूछो तो ठीक है,
छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान.
वाह
जवाब देंहटाएंछज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान.
जवाब देंहटाएंWahhh
रुखसत हो आफ़ताब, के आमद हो चाँद की,
जवाब देंहटाएंहर शाम ही हुआ है समुन्दर लहुलुहान.
वाह !! लाजवाब सृजन ।
वाह!! एक से बढ़कर एक अश्यार
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 11 जून, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह ! दिगंबर जी , बहुत खूब!
जवाब देंहटाएंएहसास दो-पहर का है सुबहा के नो बजे,
जवाब देंहटाएंगर्मी में आफ़ताब है अक्सर लहुलुहान.
वाह!!!
लाजवाब ।