स्वप्न मेरे: इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता ...

शनिवार, 30 मई 2026

इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता ...

पल पहली मुहब्बत का भुलाया नहीं जाता.
ख़त यूँ ही दराज़ों में छुपाया नहीं जाता.

जंगल में कई मेमने यह पूछ रहे हैं,
क्यों घास कभी शेर से खाया नहीं जाता.

मुमकिन है मुझे भेजा हो पैग़ाम किसी न,
बे-बात कबूतर यूँ उड़ाया नहीं जाता.

पाना है जो छुटकारा ज़रूरी हैं अंधेरे,
इस धूप में तो जिस्म से साया नहीं जाता.

उगते हैं जो गमलों में सभी पूछ रहे हैं,
क्यों गमले में जामुन को लगाया नहीं जाता.

माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.

आ चल के कहीं ढूँढ लें पशुओं में मिले तो,
इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.

10 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम का आधुनिक अंदाज़...गजबै है...उम्दा ग़ज़ल...👌👌👌

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  2. इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.
    Wahhh ❤️

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  3. वाह!! अलग-अलग एहसासों पर बेहतरीन अश्यार

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  4. आनन्द" पर सोमवार 01जून 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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    1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 01जून 2026 को लिंक की गयी है....

      http://halchalwith5links.blogspot.in
      पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

      !

      हटाएं
  5. वाह वाह वाह, बहुत सुंदर रचना

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  6. हर शेर में जीवन की सच्चाई है ।

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  7. यह 'विषय मुक्त रचना' कम लहूलूहानी-पन लिए हुए है इसीलिए इसी पर टिपण्णी सुरक्षित करते हैं!

    अपन ने जितना भी तोडा बहुत पढ़ा है आपको किश्तों में उसमे सबसे दिलचस्प अंदाज़ ए बयाँ शैली ये है ग़ालिब - माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
    यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.... इस फन के मीटर को आधार बना कर से हुंकारें तो लहूलुहान हो कर भी तर जाए पाठक IMHO :)

    बाकी सर से पाँव तक क़यामत है ये रचना ! मेमने ने BC में शेर को लाजवाब कर दिया!!

    लगे हाथों थोड़ी बाबूगिरी भी हो जाए - 'पैग़ाम किसी न', शायद 'पैगाम किसी ने' होना चाहिए, देख लीजिये ...

    प्रेमचंद बाबू भी याद कर रहे थे आपको, जब भी वक़्त मिले आपको, तो उन पर भी नज़रे इनायत हों सरकार ...! ;)

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