पल पहली मुहब्बत का भुलाया नहीं जाता.
ख़त यूँ ही दराज़ों में छुपाया नहीं जाता.
जंगल में कई मेमने यह पूछ रहे हैं,
क्यों घास कभी शेर से खाया नहीं जाता.
मुमकिन है मुझे भेजा हो पैग़ाम किसी न,
बे-बात कबूतर यूँ उड़ाया नहीं जाता.
पाना है जो छुटकारा ज़रूरी हैं अंधेरे,
इस धूप में तो जिस्म से साया नहीं जाता.
उगते हैं जो गमलों में सभी पूछ रहे हैं,
क्यों गमले में जामुन को लगाया नहीं जाता.
माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.
आ चल के कहीं ढूँढ लें पशुओं में मिले तो,
इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.
सुंदर
जवाब देंहटाएंप्रेम का आधुनिक अंदाज़...गजबै है...उम्दा ग़ज़ल...👌👌👌
जवाब देंहटाएंइंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.
जवाब देंहटाएंWahhh ❤️
वाह!! अलग-अलग एहसासों पर बेहतरीन अश्यार
जवाब देंहटाएंआनन्द" पर सोमवार 01जून 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 01जून 2026 को लिंक की गयी है....
हटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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वाह वाह वाह, बहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंहर शेर में जीवन की सच्चाई है ।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंयह 'विषय मुक्त रचना' कम लहूलूहानी-पन लिए हुए है इसीलिए इसी पर टिपण्णी सुरक्षित करते हैं!
जवाब देंहटाएंअपन ने जितना भी तोडा बहुत पढ़ा है आपको किश्तों में उसमे सबसे दिलचस्प अंदाज़ ए बयाँ शैली ये है ग़ालिब - माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.... इस फन के मीटर को आधार बना कर से हुंकारें तो लहूलुहान हो कर भी तर जाए पाठक IMHO :)
बाकी सर से पाँव तक क़यामत है ये रचना ! मेमने ने BC में शेर को लाजवाब कर दिया!!
लगे हाथों थोड़ी बाबूगिरी भी हो जाए - 'पैग़ाम किसी न', शायद 'पैगाम किसी ने' होना चाहिए, देख लीजिये ...
प्रेमचंद बाबू भी याद कर रहे थे आपको, जब भी वक़्त मिले आपको, तो उन पर भी नज़रे इनायत हों सरकार ...! ;)