पोल ऐसे ही खोल देता है.
वो कहीं कुछ भी बोल देता है.
सोच लो कम-से-कम है क्या क़ीमत,
वो तो कोड़ी का मोल देता है.
टू-द-पॉइंट जवाब दूँ कैसे,
प्रश्न जब गोल-गोल देता है.
कौन सी चैट है ख़ुदा जाने,
लोल के बदले लोल देता है.
वो मदारी है विष फ़िज़ाओं में,
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ घोल देता है.
वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है.
है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.
वाह
जवाब देंहटाएंवो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
जवाब देंहटाएंचुप ही रहने का रोल देता है
Wahhh ❤️
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 22 जून, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह!! रोचक अन्दाज़ में उम्दा शायरी
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंबहुत शानदार और तीखी ग़ज़ल है। कम शब्दों में आपने आज के समाज, राजनीति और संवाद की कई परतें खोल दी हैं। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
जवाब देंहटाएंअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!