उदासी
से घिरी तन्हा छते हैं
कई
किस्से यहाँ के घूरते हैं
परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं
नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं
मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं
नए
रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ
रिश्ते पुराने छूटते हैं
कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं
लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं
लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं
उम्दा लिखावट ऐसी लाइने बहुत कम पढने के लिए मिलती है धन्यवाद् (सिर्फ आधार और पैनकार्ड से लिजिये तुरंत घर बैठे लोन)
जवाब देंहटाएंबहुत आभार
हटाएंगजब लिपिस्टिक और मग़ :)
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया सुशील जी ...
हटाएंआपकी ग़ज़ल का मुहावरा बहुत चमकदार हो गया है. बोलचाल की भाषा में लिखना ही कविताई का सुंदरतम रूप है.
जवाब देंहटाएं'मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं'
वाह!
आभार आदरणीय ...
हटाएंनए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
जवाब देंहटाएंकहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं.. वाह बेहतरीन रचना आदरणीय
आभार अनुराधा जी ...
हटाएंग़ज़ल का हर शेर लाजवाब...पूरे परिवेश को समेटे अत्यन्त सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंबहुत आभार मीना जी ...
हटाएंकमाल की अभिव्यक्ति है आपकी...
जवाब देंहटाएंएक नए बिंब .. ऊंघती यादों को आपने शेल्फ पर सजे सामान से जोड़ दिया... कितना खूबसूरत है!
सादर
बहुत शुक्रिया ...
हटाएंबेहतरीन ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंशुक्रिया शास्त्री जी ...
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (२५-०७-२०२०) को 'सारे प्रश्न छलमय' (चर्चा अंक-३७७३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
बहुत शुक्रिया ...
हटाएंवाआह...बहुत खूब..!
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया आपका आदरणीय ...
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंआभार ओंकार जी ...
हटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंआभार आपका ...
हटाएंनए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
जवाब देंहटाएंकहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं
लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं
.. वाह! बहुत लाजवाब!
बहुत आभार है आपका कविता जी ...
हटाएंबहुत बेहतरीन रचना है।वैसे तो आप की हर रचना का अलग अंदाज़ होता है । नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
जवाब देंहटाएंकहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं.....बहुत सुंदर
बहुत शुक्रिया मधुलिका जी ...
हटाएंइतना खूबसूरत तो कभी सोचा ही नहीं. गज़ब ...
जवाब देंहटाएंलगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं
बहुत शुक्रिया शबनम जी ...
हटाएंक्या सोंचते हैं ...
जवाब देंहटाएंलिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं !!
बहुत आभार सतीश जी ...
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जवाब देंहटाएंलिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
जवाब देंहटाएंदराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं....आनंददायक ! बहुत ही जोरदार ग़ज़ल
शुक्रिया योगी जी ...
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