बेतहाशा फिसलन की राह पर
काम नहीं आता मुट्ठियों से घास पकड़ना
सुकून देता है उम्मीद के पत्थर से टकराना
या रौशनी का लिबास ओढ़े अंजान टहनी का सहारा
थाम लेती है जो वक़्त के हाथ
चुभने के कितने समय बाद तक
वक़्त का महीन तिनका
घूमता रहता है दर्द का तूफानी दरिया बन कर
पाँव में चुभा छोटा सा लम्हा
शरीर छलनी होने पे ही निकल पाता है
अभी सुख की खुमारी उतरी भी नहीं होती
आ जाती है दुःख की नई लहर
आखरी पाएदान पे जो खड़ी होती है सुख के
हर आग की जलन एक सी
किसी ठहरे हुवे सवाल की तरह
लम्हों की राख रह जाती है जगह जगह इतिहास समेटे
हाथ लगते ही ख्वाब टूट जाता है
सवाल खड़ा रहता है
उम्मीद का उजाला
आँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को
किसी साए के सहारे भी तो जिंदगी नहीं चलती
जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
३० मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
बहुत आभार श्वेता जी ...
हटाएंउम्मीद का उजाला
जवाब देंहटाएंआँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को
बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति
आभार आपका विभा जि ...
हटाएंलाजवाब
जवाब देंहटाएंबहुत आभार ...
हटाएंवाह!दिगंबर जी ,लाजवाब !
जवाब देंहटाएंउम्मीद का उजाला आँख का काजल बनकर नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद ,जंगली गुलाब को खिलने के लिए .....वाह!!
बहुत शुभा ...
हटाएंशुक्रिया शुभा जी ...
जवाब देंहटाएंवाह सुंदर बिंब और व्यंजना से सजा सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंबहुत आभार जी
हटाएंउम्मीद का उजाला
जवाब देंहटाएंआँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को
जी दिगम्बर जी , उम्मीद का आधार ठोस हो तभी उसमें आनन्द है | सुंदर रचना आपके चिर परिचित शैली से अलग | सादर
बहुत आभार आपका रेणु जी ...
हटाएंलाज़बाब... ,मार्मिक सृजन हमेशा की तरह ,सादर नमन आपको
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