यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ...
कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद
रखना ...
सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती
पतझड़ का आना बेसबब नहीं
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक
यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी
कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है
अपने आप से बातें करना
अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...
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