तप्सरों की केतली उबल गई.
बात कानों कान जब निकल गई.
क्यों हुआ कभी हुआ नहीं पता,
उनको देखते ही आँख चल गई.
हम अना के हाथ ऐंठते रहे,
पाँव पाँव ज़िन्दगी फिसल गई.
बुझते बुझते जल उठी मशाल जब,
आँधियों में एक बस्ती जल गई.
देर से मगर इसे समझ गया,
आग तेज़ हो तो दाल गल गई.
लोन क्या लिया किसी किसान ने,
देखते ही देखते फसल गई.
मैं निकल गया था घर की ओर पर,
आते आते रात शाम ढल गई.