एक मुद्दत लगी फ़साने को.
वक़्त लगता है फिर बनाने को,
एक टूटे से आशियाने को.
मसअले तो सुलझ भी जाते हैं,
कौन तैयार है भुलाने को.
तीरग़ी देख हमको है काफ़ी,
एक जुगनू तुझे मिटाने को,
उनकी यादों की आँच काफी है,
एक सिगरेट नई जलाने को.
दर्द ग़र दिल में हो तो अक्सर ही,
ज़ोर लगता है मुस्कुराने को,
चलते-चलते चलेगा सच बन कर,
झूठ लाए हैं सच छुपाने को.
वक़्त लगता है फिर बनाने को,
एक टूटे से आशियाने को.
मसअले तो सुलझ भी जाते हैं,
कौन तैयार है भुलाने को.
तीरग़ी देख हमको है काफ़ी,
एक जुगनू तुझे मिटाने को,
उनकी यादों की आँच काफी है,
एक सिगरेट नई जलाने को.
दर्द ग़र दिल में हो तो अक्सर ही,
ज़ोर लगता है मुस्कुराने को,
चलते-चलते चलेगा सच बन कर,
झूठ लाए हैं सच छुपाने को.
वाह
जवाब देंहटाएंवाह!! एक से बढ़कर एक अश्यार!! वैसे सब जानते हैं, सिग्रेट पीना सेहत के लिए हानिकारक है!! यादों को तो इस काम के लिए इस्तेमाल न करें, बल्कि यादों की ठंडक काफ़ी है, इसे बुझाने को
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 26 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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जवाब देंहटाएंवक़्त लगता है फिर बनाने को,
एक टूटे से आशियाने को.
Wahhh ❤️
बेहतरीन पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंबहुत ही खूबसूरत लिखा है ।
जवाब देंहटाएंमसअले तो सुलझ भी जाते हैं,
जवाब देंहटाएंकौन तैयार है भुलाने को.... क्या बात है...