किसी के इश्क़ में यूँ सालों-साल बैठा हूँ.
में कब से दिल में छुपा के मलाल बैठा हूँ.
नहीं है कल का भरोसा किसी का पर फिर भी,
ज़रूरतों का सभी ले के माल बैठा हूँ.
मुझे यकीन है पहचान है ज़रा मुश्किल,
लपेट कर में सलीक़े से खाल बैठा हूँ.
उदास रात की स्याही से डर नहीं लगता,
हरा भी लाल भी ले कर गुलाल बैठा हूँ.
नहीं है इश्क़ तो फिर बोल क्यों नहीं देते,
बिना ही बात में वहमों को पाल बैठा हूँ.
कभी तो झुण्ड परिन्दों का फँस ही जाएगा,
बहेलिया हूँ में फैला के जाल बैठा हूँ.
मुसाफिरों से ये कह दो के अब निकल जाएँ,
उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ.
वाह..बहुत सुंदर। ऐसा लग रहा है मेरे भावनाओं को आपने शब्द दे दिया...😅
जवाब देंहटाएंमरहबा...अद्भुत ग़ज़ल...
जवाब देंहटाएंहै हर तरफ़ दरार और मकां जर्जर है
सब छोड़ चले मै रिश्ते सम्हाल बैठा हूँ
👏👏👏
वाह
जवाब देंहटाएंवाह !! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंवाह!!!
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब..
एक शानदार गज़ल कि...मुझे यकीन है पहचान है ज़रा मुश्किल,
जवाब देंहटाएंलपेट कर में सलीक़े से खाल बैठा हूँ.
उदास रात की स्याही से डर नहीं लगता,
हरा भी लाल भी ले कर गुलाल बैठा हूँ...वाह ..वाह ..वाह
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 18 जून 2025को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह वाह वाह 🙏 बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत ही खूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंछलनी हो गया जिस्म फिर भी
जवाब देंहटाएंहाथों में लेकर मैं ढाल बैठा हूँ ... क्या बात है बहुत ख़ूब
बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत ही उम्दा पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएंkoupit ridicsky prukaz
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