स्वप्न मेरे: उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ ...

शनिवार, 14 जून 2025

उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ ...

किसी के इश्क़ में यूँ सालों-साल बैठा हूँ.
में कब से दिल में छुपा के मलाल बैठा हूँ.

नहीं है कल का भरोसा किसी का पर फिर भी,
ज़रूरतों का सभी ले के माल बैठा हूँ.

मुझे यकीन है पहचान है ज़रा मुश्किल,
लपेट कर में सलीक़े से खाल बैठा हूँ.

उदास रात की स्याही से डर नहीं लगता,
हरा भी लाल भी ले कर गुलाल बैठा हूँ.

नहीं है इश्क़ तो फिर बोल क्यों नहीं देते,
बिना ही बात में वहमों को पाल बैठा हूँ.

कभी तो झुण्ड परिन्दों का फँस ही जाएगा,
बहेलिया हूँ में फैला के जाल बैठा हूँ.

मुसाफिरों से ये कह दो के अब निकल जाएँ,
उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ.

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह..बहुत सुंदर। ऐसा लग रहा है मेरे भावनाओं को आपने शब्द दे दिया...😅

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  2. मरहबा...अद्भुत ग़ज़ल...

    है हर तरफ़ दरार और मकां जर्जर है
    सब छोड़ चले मै रिश्ते सम्हाल बैठा हूँ

    👏👏👏

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  3. वाह !! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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  4. एक शानदार गज़ल क‍ि...मुझे यकीन है पहचान है ज़रा मुश्किल,
    लपेट कर में सलीक़े से खाल बैठा हूँ.

    उदास रात की स्याही से डर नहीं लगता,
    हरा भी लाल भी ले कर गुलाल बैठा हूँ...वाह ..वाह ..वाह

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 18 जून 2025को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. छलनी हो गया जिस्म फिर भी
    हाथों में लेकर मैं ढाल बैठा हूँ ... क्या बात है बहुत ख़ूब

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