स्वप्न मेरे

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

अम्मा का दिल टूट गया ...

पुरखों का घर छूट गया
अम्मा का दिल टूट गया

दरवाज़े पे दस्तक दी
अन्दर आया लूट गया

मिट्टी कच्ची होते ही
मटका धम से फूट गया

मजलूमों की किस्मत है
जो भी आया कूट गया

सीमा पर गोली खाने
अक्सर ही रंगरूट गया

पोलिथिन आया जब से
बाज़ारों से जूट गया 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

गड्ढे में ...

मौत ने कैसा रंग जमाया गड्ढे में
मिट्टी को मिट्टी से मिलाया गड्ढे में

नेकी कर गड्ढे में डालो अच्छा है
वर्ना जितना साथ निभाया गड्ढे में

पहले तो गज भर खोदो मिल जाता था
पानी के अब खूब रुलाया गड्ढे में

मेहनत से बिगड़ी बातें बन जाती हैं
मकड़ी ने है पाठ पढ़ाया गड्ढे में

ग्रहण लगा था बचपन में तब अब्बू ने
पानी भर के चाँद दिखाया गड्ढे में

जीवन भर का साथ मगर मौत आने पर
जल्दी जल्दी हमें सुलाया गड्ढे में

घर जाते तक दुनियादारी जाग गई
मिल के डाले फूल भुलाया गड्ढे में 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए ...

कुछ यूँ फिसल के वो मेरी बाहों में आ गए 
ना चाहते हुए भी निगाहों में आ गए

सच की तलाश थी में अकेला निकल पड़ा
जुड़ते रहे थे लोग जो राहों में आ गए 

हम भीगने को प्रेम की बरसात में सनम
कुछ देर बादलों की पनाहों में आ गए

था प्रेम उनसे उनके लगे झूठ सच सभी
ना चाह कर भी उनके गुनाहों में आ गए

मशहूर हो गया है हमारा भी नाम अब
हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते ...

अपने असूलों को कभी छोड़ा नहीं करते
साँसों की ख़ातिर लोग हर सौदा नहीं करते

महफूज़ जिनके दम पे है धरती हवा पानी
हैं तो ख़ुदा होने का पर दावा नहीं करते

हर मोड़ पर मुड़ने से पहले सोचना इतना
कुछ रास्ते जाते हैं बस लौटा नहीं करते

इतिहास की परछाइयों में डूब जाते हैं
गुज़रे हुए पन्नों से जो सीखा नहीं करते

आकाश तो उनका भी है जितना हमारा है
उड़ते परिंदों को कभी रोका नहीं करते

जो हो गया सो हो गया खुद का किया था सब
अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते
  

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम
नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकन करो तुम

परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर    
व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुम

तुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरा न देना
समय फिर आए ना ऐसा की आवेदन करो तुम  

अभी भी मान लो सच को बहुत आसान होगा
कहीं लक्षमण की रेखा का न उल्लंघन करो तुम

समझदारी से अपनी बात सबके बीच रखना
कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम