स्वप्न मेरे

सोमवार, 12 मई 2014

सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं ...

मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं

मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं

है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं

वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं

रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं

चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं 

मंगलवार, 6 मई 2014

दो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

दो जमा दो पाँच जब होने लगे
अंक अपने मायने खोने लगे

कौन रखवाली करेगा घर कि जब
बेच के घोड़े सभी सोने लगे

मुश्किलों का क्या करोगे सामना
चोट से पहले ही जो रोने लगे

फैलती है सत्य की खुशबू सदा
झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
दुश्मनी के बीज जो बोने लगे 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अंतराल ...

आज, बीता हुआ कल और आने वाला कल, कितना कुछ बह जाता है समय के इस अंतराल में और कितना कुछ जुड़ जाता है मन के किसी एकाकी कोने में. उम्र कि पगडंडी पर कुछ लम्हे जुगनू से चमकते हैं ... यादों के झिलमिलाते झुरमुट रोकते हैं रास्ता अतीत से वर्तमान का ... ज़िंदगी में तुम हो, प्रेम हो, कुछ यादें हों ... क्या इतना ही काफी नहीं ...

तुम थीं, वर्तमान था
उठते हुए शोर के बीच
खनक रही थी तुम्हारी आवाज़
जो बदल रही थी धीरे धीरे
दूर होती आँखों कि मौन भाषा में
(उस पल तुम मुझसे दूर हो रहीं थीं ...)

फिर एक लंबी परवाज़
और लुप्त हो गया तुम्हारा वर्तमान चेहरा
लौट गया मन अतीत के गलियारे में
गुज़रे हुए लम्हों के बीच

बस तभी से तुम्हारा वर्तमान नज़र नहीं आ रहा

नज़र आ रहा है तो बस
पूजा कि थाली उठाये, पलकें झुकाए
गुलाबी साड़ी में लिपटा, सादगी भरा तुम्हारा रूप

सुनो, जब तुम आना, तो धीरे से आना
अतीत से वर्तमान के बीच
तुम्हें पहचानना भी तो है ...  

        

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

कच्चे शब्द ...

कोशिश में लगी रहती है ये कायनात, तमाम प्रेम करने वालों को उस जगह धकेलने की ... जहां बदलता रहता है सब कुछ, सिवाए प्रेम के ... गिने-चुने से इन ज़र्रों में बस प्रेम ही होता है और होती है बंसी कि धुन ... इसकी राह में जाने वाला हर पथिक बस होता है कृष्ण या राधा और होती है एक धुन आलोकिक प्रेम की ...


समुन्दर के उस कोने पे
टुकड़े टुकड़े उतरता है जहां नीला आसमां
सूरज भी सो जाता है थक के
नीली लहरों कि आगोश में जहां

कायनात के उसी ज़र्रे पे
छोड़ आया हूँ कुछ कच्चे शब्द

पढ़ आना उन्हें फुर्सत के लम्हों में
ढाल आना उसी सांचे में
जो तुमको हो क़ुबूल

कि हमने तो कसम खाई है
हर हाल में तुम्हें पाने की ...
     

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

निर्धारित शब्द ...

अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, तैरते रहते हैं कायनात में ... अर्जुन की कमान से निकले तीर की तरह, तलाश रहती है इन लक्ष्य-प्रेरित शब्दों को निर्धारित चिड़िया की आँख की ... बदलते मौसम के बीच मेरे शब्द भी तो बेताब हैं तुझसे मिलने को ...

ठंडी हवा से गर्म लू के थपेडों तक
खुली रहती है मेरी खिड़की
कि बिखरे हुए सफ़ेद कोहरे के ताने बाने में
तो कभी उडती रेत के बदलते कैनवस पे
समुन्दर कि इठलाती लहरों में
तो कभी रात के गहरे आँचल में चमकते सितारों में
दिखाई दे वो चेहरा कभी
जिसके गुलाबी होठ के ठीक ऊपर
मुस्कुराता रहता है काला तिल

कोई समझे न समझे
जब मिलोगी इन शब्दों से तो समझ जाओगी

मैं अब भी खड़ा हूँ खुली खिडके के मुहाने
आँखों से बुनते अनगिनत शब्द ...