मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं
मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं
है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं
वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं
रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं
चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं
मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं
है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं
वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं
रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं
चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं