क्या ऐसा होता है कुछ कदम किसी के साथ चले फिर भूल गए उस हम-कदम को ज़िन्दगी भर के लिए ... कुछ यादें जो उभर आई हों ज़हन में गुम हो जाएँ चुपचाप जैसे रात का सपना ... चेहरे पर उभरी कुछ झुर्रियाँ गायब हो जाएँ यक-ब-यक जैसे जवानी का लौटना उम्र का मोड़ जहाँ बस अतीत ही होता है हमसफ़र सब कुछ हो जाए “एब-इनीशियो” ... “जैसे कुछ हुआ ही नहीं” … सोचता हूँ कई कभी ... उम्र के उस एक पढ़ाव पर “अल्ज़ाइमर” उतना भी बुरा नहीं ...