स्वप्न मेरे: हिसाब
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बुधवार, 2 मार्च 2022

हिसाब कुछ लम्हों का ...

जल्द ही ओढ़ लेगा सन्यासी चुनर
की रात का गहराता साया
मेहमान बन के आता है रौशनी के शहर
 
मत रखना हिसाब मुरझाए लम्हों का
स्याह से होते किस्सों का
 
नहीं सहेजना जख्मी यादें
सांसों की कच्ची-पक्की बुग्नी में
 
काट देना उम्र से वो टुकड़े
जहाँ गढ़ी हो दर्द की नुकीली कीलें
और न निकलने वाले काँटों का गहरा एहसास  
 
की हो जाते हैं कुछ अच्छे दिन भी बरबाद
इन सबका हिसाब रखने में
 
वैसे जंगली गुलाब की यादों के बारे में
क्या ख्याल है ...

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

हिसाब ... बे-हिसाब यादों का ...


सुबह हुई और भूल गए
यादें सपना नहीं

यादें कपड़ों पे लगी धूल भी नहीं
झाड़ो, झड़ गई

उम्र से बे-हिसाब
जिंदगी के दिन खर्च करना
समुंदर की गीली रेत से सिप्पिएं चुनना   
सब से नज़रें बचा कर
अधूरी इमारतों के साए में मिलना
धुंए के छल्लों में
उम्मीद भरे लम्हे ढूंढना
हाथों में हाथ डाले घंटों बैठे रहना  

जूड़े में टंके बासी फूल जैसे  
क्या फैंक सकोगी यादें

बे-हिसाब बीते दिन
जिंदगी के पेड़ पे लगे पत्ते नहीं 
पतझड़ आया झड़ गए ...