स्वप्न मेरे: रिब्बन
रिब्बन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रिब्बन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 मार्च 2021

तीरगी के शह्र आ कर छूट, परछाई, गई ...

पाँव दौड़े, महके रिब्बन, चुन्नी लहराई, गई.
पलटी, फिर पलटी, दबा कर होंठ शरमाई, गई.
 
खुल गई थी एक खिड़की कुछ हवा के जोर से,
दो-पहर की धूप सरकी, पसरी सुस्ताई, गई.
 
आसमां का चाँद, मैं भी, रूबरू तुझसे हुए,
टकटकी सी बंध गई, चिलमन जो सरकाई, गई.
 
यक-ब-यक तुम सा ही गुज़रा, तुम नहीं तो कौन था,
दफ-अतन ऐसा लगा की बर्क यूँ आई, गई.
 
था कोई पैगाम उनका या खुद उसको इश्क़ था,
एक तितली उडती उडती आई, टकराई, गई.
 
जानती है पल दो पल का दौर ही उसका है बस,
डाल पर महकी कलि खिल आई, मुस्काई, गई.
 
दिन ढला तो ज़िन्दगी का साथ छोड़ा सबने ज्यूँ,
तीरगी के शह्र आ कर छूट, परछाई,
गई.