करना है ग़र तो आप इसे इनकार कीजिए,
वर्ना हमारी बात से इक़रार कीजिए.
अच्छी लगे जो बात हमारी तो यूँ करें,
अख़बार इस ग़ज़ल को लगातार कीजिए.
महफ़िल में इतने लोग हैं जिनसे मिले न दिल,
बस दूर दूर से ही नमस्कार कीजिए.
छोटी सही मगर वो सकारात्मक तो हो,
फिर मिल के इस विचार का विस्तार कीजिए.
क्यों बीच राह आपने रोका है नाव को,
इस पार कीजिए या तो उस-पार कीजिए.
बारूद के जो पेड़ उग आए हैं खेत में,
हो सकता है तो उनका भी उपचार कीजिए.
डिम्पल हो, तिल हो, जो भी हो उसका महत्व है,
ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए
वाह
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 24 अक्टूबर 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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आपकी बात से पूरा इक़रार है, मिले न जिनसे दिल उन्हें दूर से ही नमस्कार है
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