स्वप्न मेरे: के हम अब पराई कलम हो रहे हैं ...

शनिवार, 16 मई 2026

के हम अब पराई कलम हो रहे हैं ...

नफ़ा करते-करते भी कम हो रहे हैं.
बुढ़ापे में तेवर नरम हो रहे हैं.

ये दौलत की तितली पकड़ते-पकड़ते,
बहुत दूर अपनों से हम हो रहे हैं.

जमा खर्च करते हुए हमने जाना,
उधारी में डूबी रकम हो रहे हैं.

झगड़ते-लिपटते ख़रामा-ख़रामा,
शरीके-कदम हम-कदम हो रहे हैं.

किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.

दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.

ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.

ख़बर की लिखावट का तड़का है कहता,
के हम अब पराई कलम हो रहे हैं.

14 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ परक सृजन । अति सुन्दर ॥

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  2. वाह्ह सर लाज़वाब गज़ल।
    सादर।
    -------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. नफ़ा करते-करते भी कम हो रहे हैं.
    बुढ़ापे में तेवर नरम हो रहे हैं.
    क्या बात...
    दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
    सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.
    बहुत ही लाजवाब ।

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  4. वाह!! एक से बढ़कर ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराते अश्यार

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  5. किसानों के कानों में बरखा के मोती
    कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं

    वाह ! अभिनंदन ।

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  6. लपक के रिदम आ रही है इसमें दिगंबर बाबू! हिप हॉप तेवर में खूब जचेगी ये रचना ..!

    फ़लसफ़ाई तो सुभान अल्लाह है ही!

    लिखते रहिये ..!

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  7. ऊपर वाली टिपण्णी पर कॉपीराइट का दावा हमारी तरफ से दर्ज़ किया जावे :)

    सादर ..

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