स्वप्न मेरे

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजवल भविष्य ...

उम्र के किसी एक पड़ाव पर कितना तंग करने लगती है कोई सोच ... ज़िन्दगी का चलचित्र घूमने लगता है साकार हो के ... पर क्यों ... समय रहते क्यों नहीं जाग पाते हैं हम ... आधुनिकता की दौड़ ... सब कुछ पा लेने की होड़ ... या कुछ और ...

हाथ बढ़ाया तोड़ लिया
इतने करीब तो नहीं होते तारे 

उजवल भविष्य की राह
चौबीस घंटों में अड़तालीस घंटे के सफर से नहीं मिलती
निराशा ओर घोर अन्धकार के बीच
सुकून भरी जिंदगी की चाह
मरुस्थल में मीठे पानी की तलाश से कम नहीं 

जल्दी से जल्दी समेट लेने की भूख
वक़्त को समय से पहले उतार देती है शरीर में   

तेरे बालों में समय से पहले उम्र का उतर आना 
मेरी आँखों का धुंधलापन नहीं था
वो अनुवांशिक असर भी नहीं था
क्योंकि तेरे चेहरे पर सलवटों के निशान उभर आए थे  

वो मेरी समुन्दर पी जाने की चाह थी 
जो ज़ख्म भरने का इंतज़ार भी न कर सकी
रेत को मुट्ठी में रख लेने का वहशीपन
जो समय को भी अपने साथ न रख सका 

भूल गया था की पंखों का नैसर्गिक विकास
लंबे समय तक की उड़ान का आत्म-विश्वास है

क्या समय लौटेगा मेरे पास ...

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

सोमवार, 23 जनवरी 2017

प्रश्न बेतुका सा ...

शोध कहाँ तक पहुँच गया है शायद सब को पता न हो ... हाँ मुझे तो बिलकुल ही नहीं पता ... इसलिए अनेकों  बेतुके सवाल कौंध जाते हैं ज़हन में ... ये भी तो एक सवाल ही है ...

सिलसिला कितना लंबा
खत्म होने का नाम नहीं

अमीरों के जूठे पत्तल पे झपटते इंसान
फिर कुत्ता-बिल्ली
पंछी
कीट-पतंगे
दीमक
बेक्टीरिया
वाइरस

क्या पता कुछ ओर भी
जो द्रध्य नहीं

आत्म-हत्या करना आसान नही   
कुलबुलाते पेट के साथ 
आत्म-हत्या की सोच से पहले  
भूख से जीतना होता है  

पर क्या
कुते बिल्ली, कीट पतंगे दीमक
की मानसिकता में भी ऐसा होता है  

ऐसा तो नहीं आत्म-हत्या
प्राणी-जगत के 
सबसे उन्नत जीव की उपज है ... ?

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

अजीब है ये सिलसिला ... चाहता हूँ पढ़ो पर कहता हूँ मत पढ़ो ... चाहता हूँ की वो सब करो जो नहीं कर सका ... कायर हूँ ... डरपोक हूँ या शायद ... (कवी का तमगा लगाते हुए तो शर्म आती है) ...    

मत पढ़ो मेरी नज़्म

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आग उगलते शब्दों से चुनी
बदनाम गलियों के सस्ते कमरे में बुनी
ज़ुल्म के तंदूर में भुनी  
चिपक न जाएं कहीं आत्मा पर
जाग न जाए कहीं ज़मीर

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आवारा है पूनम की लहरों सी 
बेशर्म सावन के बादल सी
जंगली खयालों में पनपी
सभ्यता से परे
उतार न दे कहीं झूठे आवरण

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
उनकी लटों में उलझी हुई
ज़माने से बे-खबर सोई हुई 
बोझिल पलकों से ढलक न जाए
छूते ही गालों को दहक न जाए
बे-सुध न हो तनमन 

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...