स्वप्न मेरे: #माँ
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रविवार, 29 दिसंबर 2019

कोशिश, माँ को समेटने की - किताब

मेरी ही नज़्म से किरदार मेरा गढ़ लेंगे
कभी छपेंगे तो हमको भी लोग पढ़ लेंगे ...

और मेरी किताब यहाँ भी मिलेगी अगर आप आस-पास ही हों और पढ़ना चाहें. वैसे 7 जनवरी मैं भी रहूँगा ... इसी स्टाल पर मिलूँगा.

स्टॉल 94, हाल: 12A, बोधि प्रकाशन, प्रगति मैदान, नई दिल्ली
जनवरी 4 से 12, 2020





#कोशिश_माँ_को_समेटने_की

सोमवार, 25 सितंबर 2017

माँ ...

पाँच साल ... क्या सच में पाँच साल हो गए माँ को गए ... नियति के नाम पे कई बार नाकाम कोशिश करता हूँ खुद को समझाने की ... बस एक यही पल था जिसको मैं सोच न सका था ... उस एक लम्हे के पीछे खड़ा हो कर, उस लम्हे को सोचना चाहूँ तो भी सोच नहीं पाता ... जड़ हो जाता हूँ ... माँ का रिश्ता शायद यही है ... तुम्हें हमेशा अपने आस-पास ही पाता हूँ ...  

ओले, बारिश, तीखी गर्मी, सर पर ठंडी छतरी माँ
जोश, उमंगें, हंसी, ठिठोली, चुस्ती, फुर्ती, मस्ती माँ

घर के बूढ़े, चुप से पापा, चाचा चाची, भैया मैं
जाने किस कच्चे धागे से, सब को जोड़े रखती माँ

ऊँच नीच या तू तू मैं मैं, अगर कभी जो हो जाती 
सब तो आपस में लड़ लेते, पर खुद से ही लड़ती माँ

दर्द, उदासी, दुखड़े मन के, चेहरे से सब पढ़ लेती
छू-मंतर कर देती झट से, उम्मीदों की गठरी माँ 

पतली दुबली जाने किस पल काया में चाबी भरती
सब सो जाते तब सोती, पर सबसे पहले उठती माँ

चिंतन मनन, नसीहत निश्चय, साहस निर्णय, कर्मठता 
पल-पल आशा संस्कार, जीवन में पोषित करती माँ