स्वप्न मेरे: काँटों की हिफ़ाज़त में, ग़र गुल न उगा होता ...

शनिवार, 28 मार्च 2026

काँटों की हिफ़ाज़त में, ग़र गुल न उगा होता ...

जीवन का सफ़र हमने, तन्हा न चुना होता.
कुछ उनकी सुनी होती, कुछ अपना कहा होता.

इक बार सनम लब से डाली को छुआ होता.
मुमकिन है के पतझड़ में, पत्ता न जुदा होता.

यह बात हवाई है, यह सोच ख़याली है,
जब ऐसे किया होता, तब ऐसा हुआ होता.

आकाश के सब तारे घर भर में सजा देते,
कुछ रोज़ मेरे घर भी चंदा जो रुका होता.

कुछ साथ गुज़र जाते, कुछ याद में कट जाते,
चुप रह के तेरी बातों को हमने सुना होता.

हम तो न सही लेकिन, दो चार अटक जाते,
उल्फ़त का जो फिर तुमने, इक जाल बुना होता.

इनको तो ये तितली ही, चुन-चुन के मसल देती,
काँटों की हिफ़ाज़त में, ग़र गुल न उगा होता.

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब, ये ग़ज़ल दिल के बहुत करीब लगती है। आपने “क्या होता अगर” वाली फीलिंग को बहुत खूबसूरती से पकड़ा है। हर शेर में एक हल्का सा अफसोस है, पर वही इसे खास बनाता है। मुझे लगा जैसे कोई अपने बीते पलों को याद करते हुए खुद से बात कर रहा हो।

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