ख्व़ाब है बदनाम आवारा मेरा भटका हुआ.
मखमली सी याद है के पाँव की दस्तक कोई,
दिल के दरवाज़े में हलके से कहीं खटका हुआ.
ढेर सारी नेमतें ख़ुशियाँ उसी में बन्द हैं,
ट्रंक बापू का कबाड़े में जो है पटका हुआ.
हम तरक्क़ी के नशे में छोड़ कर हैं आ गए,
प्रेम धागा घर के रोशन-दान में लटका हुआ.
गुफ़्तगू करते थे खुद से आईने के सामने,
एक दिन हमको मिला वो बीच से चटका हुआ.
वाह ❤️🩵
जवाब देंहटाएंवाह !! हर इक अश्यार एक गहन अनुभूति, एक दृश्य और एक विचार को समेटे हुए है। अधूरे सपने, कोमल यादें, पुरानी पीढ़ी की विरासत, उपेक्षित प्रेम और आत्मसंदेह इन सभी के ताने-बाने से बुनी यह ग़ज़ल बेहद प्रभावशाली बन पड़ी है।
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंकरत करत अभ्यास से जड़ मति होत सुजान,
जवाब देंहटाएंसोच-ए-fusion की पराकाष्ठा दिखे,
तो उसे नासवा जान!
भारी टिके हुए है सरजी, कलम-ए-खुराफात के कद्रदान भी active mode में reloaded मानें!
परनाम स्वीकारे करें!
लिखते रहिए ;)
सुन्दर
जवाब देंहटाएंढेर सारी नेमतें ख़ुशियाँ उसी में बन्द हैं,
जवाब देंहटाएंट्रंक बापू का कबाड़े में जो है पटका हुआ.
दिल को छूती बहुत ही भावपूर्ण गजल
वाह!!!!
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पूरी कविता जैसे पुरानी यादों की हल्की धूप है, जिसमें धूल उड़ी हुई है लेकिन चमक भी बाकी है। हम सच में ज़िंदगी की दौड़ में वो छोटे-छोटे खजाने भूल जाते हैं, जिनमें असल में हमारी पहचान बसती है।
जवाब देंहटाएंDE831D5B
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