स्वप्न मेरे: चाहत या सोच की उड़ान ... ?

शनिवार, 2 मई 2020

चाहत या सोच की उड़ान ... ?


पूछता हूँ अपने आप से ... क्या प्रेम रहा है हर वक़्त ... या इसके आवरण के पीछे छुपी रहती है शैतानी सोच  ... अन्दर बाहर एक बने रहने का नाटक करता इंसान ... क्या थक कर अन्दर या बाहर के किसी एक सच को अंजाम दे पायेगा ... सुनो तुम अगर पढ़ रही हो तो इस बात को दिल से न लगाना ... सच तो तुम जानती ही हो ...

तुम्हें देख कर मुस्कुराता हूँ
जूड़े में पिन लगाती तुम कुछ गुनगुना रही हो

वर्तमान में रहते हुए
अदृश्य वर्तमान में उतर जाने की चाहत रोक नहीं पाता
हालांकि रखता हूँ अपना चेतन वर्तमान भी साथ

मेरे शैतान का ये सबसे अच्छा शग़ल रहा है

चेहरे पर मुस्कान लिए "स्लो मोशन" में
आ जाता हूँ तुम्हारे इतना करीब
की टकराने लगते है
तुम्हारी गर्दन के नर्म रोएं, मेरी गर्म साँसों से

ठीक उसी समय
मुन्द्वा देता हूँ नशे के आलम में डूबी तुम्हारी दो आँखें
गाढ़ देता हूँ जूड़े में लगा पिन, चुपके से तुम्हारी गर्दन में

यक-ब-यक लम्बे होते दो दांतों की तन्द्रा तोड़ कर
लौट आता हूँ वर्तमान में

मसले हुए जंगली गुलाब की गाढ़ी लाली
चिपक जाती है उँगलियों में ताज़ा खून की खुशबू लिए

मैं अब भी मुस्कुरा रहा हूँ तुम्हे देख कर
जूड़े में पिन लगाती तुम भी कुछ गुनगुना रही हो

इश ... पढ़ा तो नहीं न तुमने ...

#जंगली_गुलाब

49 टिप्‍पणियां:

  1. वाह. जंगली गुलाब की दूसरी कड़ी. बहुत प्यारी रचना.

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  2. जंगली गुलाब की कड़ी में जुड़ी एक और नायाब भावाभिव्यक्ति.

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  3. क्या बात है सर जंगली गुलाब का हुस्न तो और भी दिन पर दिन निखरता ही जा रहा है । हमेशा की तरह आप की विशिष्ट शैली में लिखी हुई पोस्ट का आनंद ही कुछ और होता है । बहुत-बहुत शुक्रिया और आभार सर

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    1. बहुत शुक्रिया अजय जी ... जंगली गुलाब दिल के करीब रहता है ...

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  4. क्या प्रेम रहा है हर वक़्त ... या इसके आवरण के पीछे छुपी रहती है शैतानी सोच...

    और सोच को अंजाम देने मुस्कराहट की आड़ लिए किसी के इतने करीब...और फिर

    गाढ़ देता हूँ जूड़े में लगा पिन, चुपके से तुम्हारी गर्दन में...

    आज के प्रेम का असली मुखौटा उतार फेंका है

    मसले हुए जंगली गुलाब की गाढ़ी लाली
    चिपक जाती है उँगलियों में ताज़ा खून की खुशबू लिए
    और फिर खोज नये जंगली गुलाब की...
    बहुत ही मार्मिक ...क्या खूबसूरत तानाबाना बुना है आज के कटु सत्य का...
    निशब्द हूँ इस अभिव्यक्ति पर..।
    उत्कृष्ट सृजन।

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  5. हे ईश्वर ! गर्दन में पिन चुभाना और ताज़ा खून... यह कविता है या हॉरर फिल्म का कोई सीन, इसे प्रेम का नाम देकर प्रेम को तो बदनाम न करें,

    मजाक की बात अलग रही, सशक्त लेखन !

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  6. रुमानियत भरी इस रचना हेतु साधुवाद आदरणीय ।

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  7. अपना कथ्य और प्रस्तुत करने का अपना अंदाज़, वाह !

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  8. बहुत ही मार्मिक रचना दिगंबर भाई।

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  9. प्रेम के इस रुहानी अंदाज कमाल का है
    बेहदद खूबसूरत अनुभूति
    बधाई

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  10. गुनगुनाना यूँ ही जारी रहे....वाह। ।शानदार।

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  12. मसले हुए जंगली गुलाब की गाढ़ी लाली
    चिपक जाती है उँगलियों में ताज़ा खून की खुशबू लिए

    मैं अब भी मुस्कुरा रहा हूँ तुम्हे देख कर
    जूड़े में पिन लगाती तुम भी कुछ गुनगुना रही हो.....क्या सुन्दर उपमाएं देते हैं आप।  बहुत ही बेहतरीन संवाद लेकिन एक तरफ़ा क्यूंकि आपने खुद पूछा -तुमने पढ़ा तो नहीं 

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  13. ये कशमकश भी बड़ा प्यारा है ।

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