ठीक उसी वक्त
जब अंधेरा घर वापसी की तैयारी करता है
उजाला बादलों के पीछे से अपने आने की खबर देने लगता है
भूलने लगते हैं सब अंधेरे का अस्तित्व
हालांकि सच तो ये है
दिन का उजाला मन के अंधेरे को ढांप नहीं पाता
उस दिन मझे भी ऐसा महसूस हुवा था
तुम चली गई हमेशा हमेशा के लिए उस रौशनी के साथ
बिना सोचे समझे की रौशनी का अस्तित्व केवल अंधेरे से है
एक ही सिक्के के दो पहलू
मैं तो उसी लम्हे से शैतान बन गया था
अंधेरे के साथ आता रहा, जाता रहा
और अब तो कभी कभी
रौशनी के आने पे भी पसरा रहता हूँ
कभी पेड़ की छाया में
या कभी गुनाह की आड़ में ...
सच बताना क्या तुम मुझे अभी भी प्यार नहीं करतीं ...?
अंधेरे से तो तुम्हे भी प्यार था बचपन से ...?