आँखों में तैरती प्रश्नों की भीड़
मुँह में ज़ुबान रखने का अदम्य साहस
दिल में चिंगारी भर गर्मी
और जंगल जलाने का निश्चय
पहाड़ जैसी व्यवस्था
और दो दो हाथ करने की चाह
साँस लेता दमा
और हाथों में क्रांति का बिगुल
हथोड़े की चोट को
शब्दों में ढालने की जंगली जिद्द
जिस्म के पसीने से निकलती
गाड़े लाल रंग की बू
उसे तो मरना ही था
कोयले की खादान में रह कर
कमीज़ का रंग सफेद जो था...
बुधवार, 11 जनवरी 2012
गुरुवार, 5 जनवरी 2012
बदलाव ...
वो रचना चाहते हैं नया इतिहास
पर नहीं भूलना चाहते
खरोच के निशान
बदलना चाहते हैं परम्पराएं
पर नहीं छोड़ना चाहते अधूरा विश्वास
बनाना चाहते हैं नए नियम
नहीं बदलना चाहते पुरानी परिपाटी
खुला रख के घावों को
करना चाहते हैं निर्माण
लहू के रंग से लिखना चाहते हैं
प्रेम की नयी इबारत
ज़ख़्मी ईंटों की नीव पे
खड़ा करना चाहते हैं
बुलंद इमारत
क्या सच में इतने मासूम हैं
पर नहीं भूलना चाहते
खरोच के निशान
बदलना चाहते हैं परम्पराएं
पर नहीं छोड़ना चाहते अधूरा विश्वास
बनाना चाहते हैं नए नियम
नहीं बदलना चाहते पुरानी परिपाटी
खुला रख के घावों को
करना चाहते हैं निर्माण
लहू के रंग से लिखना चाहते हैं
प्रेम की नयी इबारत
ज़ख़्मी ईंटों की नीव पे
खड़ा करना चाहते हैं
बुलंद इमारत
क्या सच में इतने मासूम हैं
बुधवार, 28 दिसंबर 2011
तेरा एहसास ...
आप सभी को नव वर्ष की बहुत बहुत मंगलकामनाएं ...
तुमसे अलग होने बाद
कितनी बार तुमसे अलग होना चाहा
पर हो न सका
सुबह की अखबार के साथ
तुम घर में घुसती हो
तो तमाम कोशिशों के बावजूद निकलती नहीं
ख़बरों के साथ
तेरे एहसास को फ्लश आउट करने की कोशिश तो करता हूँ
पर तभी चाय की खुशबू अपना असर दिखाना शुरू कर देती है
और तुम ...
तुम चुस्कियों के साथ
मेरे जिस्म में उतरने लगती हो
सुबह से शाम तुम्हारी गिरफ्त में
कब दिन बीत जाता है पता नहीं चलता
रात होते होते तमाम रद्दी बेचने का निश्चय करता हूँ
पर सुबह आते आते फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है
तेरी यादों की तरह
पुरानी अखबार का ढेर भी बढ़ता जा रहा है
इक बार को ये चाय की आदत तो छोड़ भी दूं
पर इस अखबार का क्या करूं
ये कमबख्त तो अब तीन सौ पैंसठ दिन
छपने लगी है
तुमसे अलग होने बाद
कितनी बार तुमसे अलग होना चाहा
पर हो न सका
सुबह की अखबार के साथ
तुम घर में घुसती हो
तो तमाम कोशिशों के बावजूद निकलती नहीं
ख़बरों के साथ
तेरे एहसास को फ्लश आउट करने की कोशिश तो करता हूँ
पर तभी चाय की खुशबू अपना असर दिखाना शुरू कर देती है
और तुम ...
तुम चुस्कियों के साथ
मेरे जिस्म में उतरने लगती हो
सुबह से शाम तुम्हारी गिरफ्त में
कब दिन बीत जाता है पता नहीं चलता
रात होते होते तमाम रद्दी बेचने का निश्चय करता हूँ
पर सुबह आते आते फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है
तेरी यादों की तरह
पुरानी अखबार का ढेर भी बढ़ता जा रहा है
इक बार को ये चाय की आदत तो छोड़ भी दूं
पर इस अखबार का क्या करूं
ये कमबख्त तो अब तीन सौ पैंसठ दिन
छपने लगी है
सोमवार, 19 दिसंबर 2011
मुक्ति ...
क्या ये सच है
लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ... ?
कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
सातवें आसमान तक जाती है ... ?
सच लगता है जब श्रोता की तरह सोचता हूँ
पर जब कवि मन से विवाद होता है
अपने आप से आँखें चुराने लगता हूँ
हकीकत में तो
कवि अपनी सोची समझी सोच को
शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
विशेष विचारधारा का गुलाम
अपने ही फ्रेम में जकड़ा
सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
जिसके आवरण में वो सांस ले सके
एक सिमित सा आकाश
जिसमें वो जीता है मरता है
कलाकार होने का दावा करता है
आम आदमी की जमात से ऊपर उठ के
बुद्धिजीवी होने का दावा
सुनो कवि
अपने आप को रिक्त करो
मान्यताएं, विचारधारा
अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
ये कारा तोड़ो
सत्य को सत्य की नज़र से देखो
अपने केनवास के किनारे तोड़ो
पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
तो कवि धर्म निभाओ
अपने आप से मुक्ति पाओ
लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ... ?
कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
सातवें आसमान तक जाती है ... ?
सच लगता है जब श्रोता की तरह सोचता हूँ
पर जब कवि मन से विवाद होता है
अपने आप से आँखें चुराने लगता हूँ
हकीकत में तो
कवि अपनी सोची समझी सोच को
शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
विशेष विचारधारा का गुलाम
अपने ही फ्रेम में जकड़ा
सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
जिसके आवरण में वो सांस ले सके
एक सिमित सा आकाश
जिसमें वो जीता है मरता है
कलाकार होने का दावा करता है
आम आदमी की जमात से ऊपर उठ के
बुद्धिजीवी होने का दावा
सुनो कवि
अपने आप को रिक्त करो
मान्यताएं, विचारधारा
अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
ये कारा तोड़ो
सत्य को सत्य की नज़र से देखो
अपने केनवास के किनारे तोड़ो
पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
तो कवि धर्म निभाओ
अपने आप से मुक्ति पाओ
मंगलवार, 13 दिसंबर 2011
कमबख्त यादें ...
कई बार
निकाल बाहर किया तेरी यादों को
पर पता नहीं
कौन सा रोशनदान खुला रह जाता है
सुबह की धूप के साथ
झाँकने लगती हो तुम कमरे के अंदर
हवा के ठन्डे झोंके के साथ
सिरहन की तरह दौड़ने लगती हो पूरे जिस्म में
चाय के हर घूँट के साथ
तेरा नशा बढ़ता जाता है
घर की तमाम सीडियों में बजने वाले गीत
तेरी यादों से अटे पड़े हैं
तेज़ संगीत के शोर में भी तुम
मेरे कानों में गुनगुनाने लगती हो
न चाहते हुवे भी एक ही सीडी बजाने लगता हूँ हर बार
तुम्हें याद है न वो गीत
अभी न जाओ छोड़कर .... के दिल अभी भरा नहीं ...
फिल्म हम दोनों ... देव आनंद और साधना ...
उलाहना देती रफ़ी की दिलकश आवाज़ ....
जाने कब नींद आ जाती है रोज की तरह
सो जाता हूँ तेरे एहसास का कम्बल लपेटे ...
हमेशा की तरह ...
निकाल बाहर किया तेरी यादों को
पर पता नहीं
कौन सा रोशनदान खुला रह जाता है
सुबह की धूप के साथ
झाँकने लगती हो तुम कमरे के अंदर
हवा के ठन्डे झोंके के साथ
सिरहन की तरह दौड़ने लगती हो पूरे जिस्म में
चाय के हर घूँट के साथ
तेरा नशा बढ़ता जाता है
घर की तमाम सीडियों में बजने वाले गीत
तेरी यादों से अटे पड़े हैं
तेज़ संगीत के शोर में भी तुम
मेरे कानों में गुनगुनाने लगती हो
न चाहते हुवे भी एक ही सीडी बजाने लगता हूँ हर बार
तुम्हें याद है न वो गीत
अभी न जाओ छोड़कर .... के दिल अभी भरा नहीं ...
फिल्म हम दोनों ... देव आनंद और साधना ...
उलाहना देती रफ़ी की दिलकश आवाज़ ....
जाने कब नींद आ जाती है रोज की तरह
सो जाता हूँ तेरे एहसास का कम्बल लपेटे ...
हमेशा की तरह ...
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