माँ बाप की तो खैर, कबूरत उदास है,
परदेस घर के बच्चे चले घर उदास हैI
तितली परिंदे, मेघ, हवा, फूल सब खफ़ा,
तुम क्या गए के सुरमई मंज़र उदास हैI
बरसेगा छत पे कान में बादल के बोल दो,
डूबा हुआ हूँ इश्क़ में छप्पर उदास हैI
काँटा उसे भी इश्क़ में शायद चुभा न हो,
जिस बात पे वो खुश था उसी पर उदास हैI
सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI
कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI
गर्दन पे जब चला है तो बे-खौफ चल गया,
है आज धार कुंद तो खंज़र उदास हैI
लाजवाब
जवाब देंहटाएंकागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
जवाब देंहटाएंयह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI
अद्भुत खयाल ... शानदार
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 21 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह!! बेहतरीन शायरी
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन
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