भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
ग़म न बाँटों किसी से किसी हाल में.
जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.
धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
सब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.
रिश्ते-नाते, मुहब्बत, ये बन्धन, वचन,
मौज लोगे न आओगे गर जाल में.
आप चाहें न चाहें ये बस में नहीं,
मिल ही जाएँगे कंकड़ हर इक दाल में.
अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जब उतरना हैं जीवन के इस ताल में.
साल-दर-साल आता है मुड़-मुड़ के कुछ,
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में.
आपकी हर गजल बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। आपने जिस तरह इस जीवन में गहरे फलसफे और व्यावहारिक सत्यों को बेहद खूबसूरती से बयां करते हुए 'दाल में कंकड़', 'खरगोश-कछुए की चाल' और 'जीवन के ताल' जैसे अत्यंत सरल और रोजमर्रा के प्रतीकों के जरिए सत्ता, दौलत और मानवीय बंधनों के मायाजाल को बखूबी उजागर किया है, वह सिर्फ आप ही कर सकते हो।
जवाब देंहटाएंआपकी इस गजल का हर शेर इंसान को दुखों को भुलाकर, दुनिया के छलावे से दूर रहने और सहजता से जीने का जो संदेश देता है, वह मन में एक गहरा मनोवैज्ञानिक असर छोड़ता है।
आपकी यह रचना निश्चित ही अपनी सरल शब्दावली, दार्शनिक गहराई और जीवन के यथार्थवादी चित्रण के कारण हर गजल की तरह एक उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक कृति है।
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जवाब देंहटाएंजब उतरना है जीवन के इस ताल में.
वाह!! उम्दा शायरी
धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
जवाब देंहटाएंसब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.
कटु सत्य
हर शेर एक सार्थक सत्य को उद्घाटित करती हुई
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 13 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
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जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 15 जुलाई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बहुत बढ़िया लिखा है , असरदार ।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
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