बाज़ी ये कभी जीत के हारा न करो तुम.
शतरंज में प्यादों को उतारा न करो तुम.
है भूल अगर इश्क़ जो हम से, तो सितमगर,
भूले से भी ये भूल सुधारा न करो तुम.
सरगोशियाँ बस्ती की ये बदनाम करेंगी,
आवाज़ दे के हम को पुकारा न करो तुम.
जीवन के ये जो खेल हैं उत्सव से नहीं कम,
जीतो न अगर शर्त तो हारा न करो तुम.
जीने की जो आदत है जियो वक़्त को हर पल,
बेकार कभी वक़्त गुज़ारा न करो तुम.
ख़ुद ढूँढ के पीना जो समुंदर की तलब है,
नदिया को नमक डाल के खारा न करो तुम.
अब हो जो गया इश्क़ तो फिर क्या ही करोगे,
पर कर के वही काम दुबारा न करो तुम.
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वाह क्या ग़ज़ल है...👏👏👏
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 09 मई, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
वाह!! बेहतरीन शायरी
जवाब देंहटाएंबहुत ख़ूब नासवा जी
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्यारी रचना हैं दिगंबर जी! बहुत ही रोचक और सरस शेरों से सजी हैं! हार्दिक शुभकामनायें आपको 🙏
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर
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सुंदर
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