रौशनी की बाहों में, फिर से ये शहर होगा.
वक्त तो मुसाफ़िर है किसके पास ठहरा है,
आज है ये मुट्ठी में कल ये मुख़्तसर होगा.
मस्तियों में रहता है, हँस के दर्द सहता है,
तितलियाँ पकड़ता है, प्यार का असर होगा.
फ़र्श घास का होगा, बादलों की छत होगी,
ये हवा का घेरा ही बे-घरों का घर होगा.
वक्त तो मुसाफ़िर है किसके पास ठहरा है,
आज है ये मुट्ठी में कल ये मुख़्तसर होगा.
मस्तियों में रहता है, हँस के दर्द सहता है,
तितलियाँ पकड़ता है, प्यार का असर होगा.
फ़र्श घास का होगा, बादलों की छत होगी,
ये हवा का घेरा ही बे-घरों का घर होगा.
पलकों की हवेली में ख़्वाब का खटोला है,
ख़ुश्बुओं के आँगन में, इश्क़ का शजर होगा.
छुट्टियों पे बादल हैं मस्त सब परिंदे हैं,
सोचता हूँ फिर कैसे, चाँद पे डिनर होगा.
नींद की खुमारी में, लब जो थरथराए हैं,
हुस्न को ख़बर है सब, इश्क़ बे-ख़बर होगा.
खिड़कियों को ढक लो तो धूप रुक भी जाती है,
रोक ले जो यादों को ऐसा क्या शटर होगा.
(तरही ग़ज़ल)
वाह
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 10 नवम्बर 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंशानदार
जवाब देंहटाएंवाह!! नये नये बिंबों से सजी बेहद खूबसूरत सी ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंवाह वाह वाह, बेहतरीन ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंवाह्ह बेहद लाज़वाब, शानदार गज़ल सर।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ११ नवंबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
वाह! क्या खूब !
जवाब देंहटाएंBahut hi sundar ghazal, aur akhiri sher sab se achha!!!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंवक्त तो मुसाफ़िर है किसके पास ठहरा है,
जवाब देंहटाएंआज है ये मुट्ठी में कल ये मुख़्तसर होगा.
वाह !!
बहुत सुन्दर !!
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