स्वप्न मेरे: गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है ...

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है ...


कहीं खामोश है कंगन, कहीं पाज़ेब टूटी है
सिसकता है कहीं तकिया, कहीं पे रात रूठी है

अटक के रह गई है नींद पलकों के मुहाने पर
सुबह की याद में बहकी हुई इक शाम डूबी है

यहाँ कुछ देर बैठो चाय की दो चुस्कियाँ ले लो
यहीं से प्रेम की ऐ. बी. सी. पहली बार सीखी है

न क्यों सब इश्क़ के बीमार मिल कर के बहा आएँ
इसी सिन्दूर ने तो आशिकों की जान लूटी है

उसे भी एड़ियों में इश्क़ का काँटा चुभा होगा
मेरी भी इश्क़ की पगडंडियों पे बाँह छूटी है

धुंवे में अक्स तेरा और भी गहरा नज़र आए   
किसी ने साथ सिगरेट के तुम्हारी याद फूँकी है

झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है

बहाने से बुला लाया जुनूने इश्क़ भी तुमको
खबर सर टूटने की सच कहूँ बिलकुल ही झूठी है

किसी की बाजुओं में सो न जाए थक के ये फिर से
गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है

49 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 14 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


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    1. आपकी रचना की पंक्ति-

      "झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी"

      हमारी प्रस्तुति का शीर्षक होगी।

      हटाएं
  2. बेहद शानदार गज़ल सर।
    हर बंध बेहतरीन है।

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  3. बेहद खूबसूरत ...भावों का सागर निर्बाध गति से बहता हुआ..लाजवाब सृजनात्मकता ।

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. कितनी भी दाद दूँ, बहुत कम पड़ेगी. कमाल की ग़ज़ल.

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-07-2020) को     "बदलेगा परिवेश"   (चर्चा अंक-3763)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  7. बहुत खूब अशआर हुए हैं। मुबारक हो।

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  8. बहुत दिल से लिखा है ।

    रेखा श्रीवास्तव

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  9. उसे भी एड़ियों में इश्क़ का काँटा चुभा होगा
    मेरी भी इश्क़ की पगडंडियों पे बाँह छूटी है

    धुंवे में अक्स तेरा और भी गहरा नज़र आए
    किसी ने साथ सिगरेट के तुम्हारी याद फूँकी है

    झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
    मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है
    वाह ! प्यासे को जैसे पानी की बूँद मिल गयीं !! जबरदस्त ग़ज़ल !! लम्बे इंतज़ार के बाद ग़ज़ल आई है आपकी 

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  10. "झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
    मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है"

    बेहद खूबसूरत गजल,निशब्द हूँ कि-कैसे प्रशंसा करूँ,एक एक शेर दिल में उतरता गया.
    सादर नमन आपको

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  11. बहुत खूबसूरत। निःशब्द कर दिया सर आपने।

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  12. बहुत खूबसूरत। निःशब्द कर दिया सर आपने।
    Thanks For Sharing
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  13. बहुत खूबसूरत शायरी. दाद स्वीकारें.

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