स्वप्न मेरे: घास उगी सूखे आँगन ...

सोमवार, 5 अगस्त 2019

घास उगी सूखे आँगन ...


धड़ धड़ धड़ बरसा सावन
भीगे, फिसले कितने तन

घास उगी सूखे आँगन
प्यास बुझी ओ बंजर धरती तृप्त हुई
नीरस जीवन से तुलसी भी मुक्त हुई,
झींगुर की गूँजे गुंजन
घास उगी ...

घास उगी वन औ उपवन
गीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हुई
हरा बिछौना कोमल तन की सेज हुई
दृश्य है कितना मन-भावन
घास उगी ...

हरियाया है जीवन-धन
कुछ काँटे भी कुछ फूलों के साथ उगे
आते जाते इसके उसके पाँव चुभे
सिहर गया डर से तन मन   
घास उगी ...

33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत.. बारिश के साथ प्रकृति परिवर्तन का खूबसूरत शब्दचित्र ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-08-2019) को "मेरा वजूद ही मेरी पहचान है" (चर्चा अंक- 3419) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुन्दर सर सावन की महक महका रही है
    सादर

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 6 अगस्त 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. बहुत सहज-स्वाभाविक पुलकभरा चित्रण.

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    1. बहुत आभार ... अच्छा लगा लम्बे समय बाद आपको ब्लॉग पर सक्रीय देख कर ...

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  7. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नये भारत का उदय - अनुच्छेद 370 और 35A खत्म - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. बहुत खूब , आदरनीय दिगम्बर जी ! सावन की महिमा गाता मधुर गान बहुत मनभावन है | सरस शब्दावली !! फूलों के साथ कांटे भी वाह ! कवि दृष्टि से कुछ भी छुप पाना संभव नहीं | सादर

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    1. सावन हर पल को महत्वपूर्ण बना देता है ...
      आभार आपका ...

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  9. ख़ुशी में भी पीड़ा का अहसास भूलना नहीं चाहिए. प्रकृति यही सिखाती है हमे. आपकी कविता भी इस सच को बड़े करीने से सवांर कर पेश कर रही है. लाजवाब.

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  10. वर्षा ऋतु का मनमोहक चित्रण

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  11. वाह, सच में ऐसी रचनाएं आपकी ही कलम से निकल सकती हैं बहुत बढिया दिगम्बर जी

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  12. हरियाया है जीवन-धन
    कुछ काँटे भी कुछ फूलों के साथ उगे
    आते जाते इसके उसके पाँव चुभे
    सिहर गया डर से तन मन
    घास उगी ...बहुत बेहतरीन

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