यूं ही हवा में नहीं बनते प्रेम-किस्से
शहर की रंग-बिरंगी इमारतों से ये नहीं निकलते
न ही शराबी मद-मस्त आँखों से छलकते हैं
ज़ीने पे चड़ते थके क़दमों की आहट से ये नहीं जागते
बनावटी चेहरों की तेज रफ़्तार के पीछे छिपी फाइलों के बीच
दम तोड़ देते हैं ये किस्से
कि यूं ही हवा में नहीं बनते प्रेम-किस्से
पनपने को अंकुर प्रेम का
जितना ज़रूरी है दो पवित्र आँखों का मिलन
उतनी ही जरूरी है तुम्हारी धूप की चुभन
जरूरी हैं मेरे सांसों की नमी भी
उसे आकार देने को
कि यूं ही हवा में नहीं बनते प्रेम-किस्से
प्रेम-किस्से आसमान से भी नहीं टपकते
ज़रुरी होता है प्रेम का इंद्र-धनुष बनने से पहले
आसमान से टपकती भीगी बूँदें
ओर तेरे अक्स से निकलती तपिश
जैसे जरूरी है लहरों के ज्वार-भाटा बनने से पहले
अँधेरी रात में तन्हा चाँद का भरपूर गोलाई में होना
ओर होना ज़मीन के उतने ही करीब
जितना तुम्हारे माथे से मेरे होठ की दूरी
कि यूं ही हवा में नहीं बनते प्रेम-किस्से
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