नाप के नक़्शे बनाए ... क्या
हुआ
क्या खज़ाना ढूंढ पाए ... क्या
हुआ
नाव कागज़ की उतारी थी अभी
रुख हवा का मोड़ आए ... क्या
हुआ
कुछ उजाला बांटते, पर सो गए
धूप जेबों में छुपाए ... क्या
हुआ
आसमानी शाल तो ओढ़ी नहीं
कुछ सितारे तोड़ लाए ... क्या
हुआ
क्या हुआ, कुछ
तो हुआ अब बोल दो
मन ही मन क्यों मुस्कुराए ... क्या
हुआ
ये कोई मेहमान तो लगते नहीं
आ गए क्यों बिन-बुलाए ... क्या
हुआ
तुम बताओ जो नहीं है प्यार तो
क्यों हमारे गीत गाए ... क्या हुआ
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जवाब देंहटाएंआदरणीय दिगम्बर जी -- आपके ब्लॉग पर जब जब आई कुछ नया नहीं , अपितु नायाब पाया | | लेखन का ये रंग बहुत ही अद्भुत है | --
जवाब देंहटाएंकुछ उजाला बांटते, पर सो गए
धूप जेबों में छुपाए ... क्या हुआ
आसमानी शाल तो ओढ़ी नहीं
कुछ सितारे तोड़ लाए ... क्या हुआ!!!!!!!!
इतने सुंदर सार्थक प्रश्न वो भी इतनी बेबाकी और नज़ाकत से !!!!!!!!
वाह और सिर्फ वाह !!!!!!!!!!!
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