स्वप्न मेरे

शुक्रवार, 11 जून 2021

कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं ...

देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.
 
सोच लो तानोगे छतरी या तुम्हे है भीगना,
आसमाँ पे प्रेम का बादल अभी छाया नहीं.
 
प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,  
लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.
 
पत्थरों से दिल लगाने का हुनर भी सीख लो,
फिर न कहना वक़्त रहते हमने समझाया नहीं.
 
प्रेम हो, शृंगार, मस्ती, या विरह की बात हो,
कौन सा है रंग जिसको प्रेम ने गाया नहीं.
 
तुमको पाया, रब को पाया, और क्या जो चाहिए,
कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं.

गुरुवार, 3 जून 2021

तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही ...

इक पुरानी याद दिल से मुद्दतों लिपटी रही.
घर, मेरा आँगन, गली, बस्ती मेरी महकी रही.
 
कुछ उजाले शाम होते ही लिपटने आ गए,
रात भर ये रात छज्जे पर मेरे अटकी रही.
 
लौट कर आये नहीं कुछ पैर आँगन में मेरे,
इक उदासी घर के पीपल से मेरे लटकी रही.
 
उनकी आँखों के इशारे पर सभी मोहरे हिले,
जीत का सेहरा भी उनका हार भी उनकी रही.
 
चाँद का ऐसा जुनूं इस रात को ऐसा चढ़ा,
रात सोई फिर उठी फिर रात भर उठती रही.
 
रौशनी के चोर चोरी रात में करने चले,
तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही.

बुधवार, 26 मई 2021

घुमड़ते बादलों को प्रेम का कातिब बना देना ...

घुमड़ते बादलों को प्रेम का कातिब बना देना.
सुलगती शाम के मंज़र को गजलों में बता देना.
 
बदल जाएगा मौसम धूप में बरसात आएगी,
मिलन के चार लम्हे जिंदगी के गुनगुना देना.
 
बुराई ही नहीं अच्छाई भी होती है दुनिया में,
बुरा जो ढूंढते हर वक़्त उनको आईना देना.
 
तलाशी दे तो दूं दिल की तुम्हारा नाम आये तो, 
तुम्हें बदनाम करने का मुझे इलज़ाम ना देना.
 
दिलों के खेल में जो ज़िन्दगी को हार बैठे हैं,
उन्हें झूठी मुहब्बत का कभी मत झुनझुना देना.

मंगलवार, 11 मई 2021

आकाश में तारों का आज रात पिघलना ...

जेबों में चराग़ों को अपने ले के निकलना.
मुमकिन है के थम जाए आज रात का ढलना.
 
है गाँव उदासी का आस-पास संभालना.
हो पास तेरे कह-कहों का शोर तो चलना.
 
मासूम पतंगों की ज़िन्दगी से न खेलो,
हर बार तो अच्छा नहीं मशाल का जलना.
 
कश्ती को चलाने में होंसला है ज़रूरी,
मंज़ूर नहीं हम को साहिलों पे फिसलना.
 
पतझड़ के हैं पत्ते न दर्द रोक सकोगे,
क़दमों को बचा कर ही रास्तों पे टहलना.
 
हर मोड़ पे आती हैं लौटने की सदाएँ,
रिश्तों को समझ कर ही अपने घर को बदलना.
 
आहों का असर था के कायनात की साज़िश,
आकाश में तारों का आज रात पिघलना. 

मंगलवार, 4 मई 2021

शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर ...

लुप्त हो जाते हें जब इस रात के बोझिल पहर.
मंदिरों की घंटियों के साथ आती है सहर.


शाम की लाली है या फिर श्याम की लीला कोई,
गेरुए से वस्त्र ओढ़े लग रहा है ये शहर.
 
पूर्णिमा का चाँद हो के हो अमावस की निशा,
प्रेम के सागर में उठती है निरंतर इक लहर.
 
एक पल पर्दा उठा, नज़रें मिलीं, उफ़ क्या मिलीं,
हो वही बस एक पल फिर जिंदगी जाए ठहर. 
 
धूप नंगे सर उतर आती है छत पर जब कभी,
तब सुलग उठता है घर आँगन गली, सहरा दहर.
 
शब्द जैसे बांसुरी की तान मीठी सी कहीं,
तुम कहो सुनता रहूँगा, काफिया हो, क्या बहर.
 
इस विरह की वेदना तो प्राण हर लेगी मेरे,
शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर.