गज़लों के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक कविता ... आशा है
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तुम कहती हो लिखो कोई कविता
मेरे पे ...
बस मेरे पे ...
और मैं सोचने लगता हूँ
क्या लिखूं
तुम पे … बस तुम पे ...
क्योंकि तुमको अपने से अलग तो कभी सोच ही नहीं पाया मैं
तो अपने आप पर लिखूं ...
पर कैसे ...
वैसे भी कुछ लिखने के लिए
अतीत या भविष्य में उतरना होगा
कुछ पल के लिए ही सही
तुमसे दूर तो होना होगा
बताओ ...
क्या सह पाओगी ये दूरी ...
अपने आप पे कविता या कुछ पल की दूरी
कहो ... क्या है जरूरी ...
क्या अच्छा नहीं हम यूं ही जीते रहें ...
वर्तमान को संजोते रहें ...
ये भी तो इक कविता है समय के पंखों पे लिखी ...
हम दोनों की सजीव कविता ...