टूट कर बिखरा हुवा था आइना,
धर्म पर निभा रहा था आइना,
खून से लिख्खे हुवे इतिहास को,
आइना दिखला रहा था आइना,
देख कर वो सत्य सह न पायेगा,
सत्य पर दोहरा रहा था आइना,
तुमने काहे देख ली अपनी छवि,
गर्व से इठला रहा था आइना,
पत्थरों ने रची थीं ये साज़िशें,
कांच कांच सा रहा था आइना,
अंधों के घर आईने ही आईने,
ख़ुद पे तरस खा रहा था आइना,
कौन जाने कौन शहर बिकेगा,
सोच कर घबरा रहा था आइना,
मांग सूनी, भरी पर प्रति-बिम्ब मैं,
कोई गज़ब ढा रहा था आइना,
तोड़ कर हर एक टुकड़ा आईने का,
आईने बना रहा था आइना,
तुमने काहे देख ली अपनी छवि,
जवाब देंहटाएंगर्व से इठला रहा था आइना,
लाजवाब.....बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...बधाई.
नीरज
खून से लिख्खे हुवे इतिहास को,
जवाब देंहटाएंआइना दिखला रहा था आइना,
--बहुत बेहतरीन प्रयोग. आनन्दम, आनन्दम!! वाह!
तुमने काहे देख ली अपनी छवि,
जवाब देंहटाएंगर्व से इठला रहा था आइना,
बहुत ख़ूब.
वो मेरा आईना है और मैं उसकी परछाई हूँ....मेरे घर में भी रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन (निदा फाजिली) पता नहीं आईने पर कोई भी कुछ लिखता है...अच्छा ही बन पड़ता है....
जवाब देंहटाएंlajawaab ! bahut bahut sundar.Sateek.
जवाब देंहटाएंmuje dekh kar sharmata hai aina.....
जवाब देंहटाएंaage ki tukbandi kar dena bhai....
bahut khubsurat likhte ho.......
hindustan me itni pratibhaye hai .....blogs ki duniya me dekh lo....
नारंग साहब
जवाब देंहटाएंआपकी लाइनों के साथ तुकबंदी थोड़े हास्य के साथ
मुझे देख कर शर्माता है आइना
तुझे देख कर मुस्कुरता है आइना
जब हम दोनों नज़र आते हैं
बहुत जोर से खिसियाता है आइना
बाप रे बाप....रब्बा मेरे रब्बा....मौला मेरे मौला....हाय माँ कित्ता...कित्ता...कित्ता अच्छा लिखते हो आप.....
जवाब देंहटाएं531CBCA060
जवाब देंहटाएंkiralık hacker
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