स्वप्न मेरे

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

सिन्दूर बनके सजता हूँ

खुशी या गम हो तेरे आंसुओं में ढलता हूँ
तुझे ख़बर है तेरी चश्मे-नम में रहता हूँ

क्या हुवा जो तेरा हाथ भी न छू सका
तेरे माथे की सुर्ख चांदनी में जलता हूँ

है और बात तेरे दिल से हूँ मैं दूर बहुत
तुम्हारी मांग में सिन्दूर बनके सजता हूँ

मैंने माना तेरी खुशियों पर इख्तियार नही
तेरे हिस्से का गम खुशी खुशी सहता हूँ


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तेरा ख्याल मेरे दिल से क्यों नही जाता
जब कभी सामने आती हो कह नही पाता

तमाम बातें यूँ तो दिल में मेरे रहती हैं
तुम्हारे सामने कुछ याद ही नही आता

रविवार, 25 जनवरी 2009

ईंट गारे की जगह आदमी जड़े हैं

हमारे पाव फ़िर ज़मीन में गड़े हैं
हम पेड़ जैसे रास्तों में खड़े हैं

आदतें आज भी संघर्ष की छोड़ी नही
भूख और प्यास से अभी अभी लड़े हैं

सच्च तो ये है इस खूबसूरत ताज में
ईंट गारे की जगह आदमी जड़े हैं

भूख और प्यास के डर से खुदा भी
झोंपडे छोड़ कर मंदिरों में पड़े हैं

एक सच्चाई है इन खोखले जिस्मों की
छोटे से ज़ख्म मौत आने तक सड़े हैं

होठ सूखे, धंसी आँखें चिथडा सा बदन
जिस्म जैसे किसी पतझर में पत्ते झडे हैं

वो प्यासा था या कोई चोर जो गुजरा यहाँ
तमाम रास्तों में खाली खाली घड़े हैं

सोमवार, 19 जनवरी 2009

जिंदगी की रेल है

इस ग़ज़ल के पहले २ शेर मैंने १० साल पहले लिखे थे और ये ग़ज़ल मेरे दिल के बहोत करीब है. कुछ और शेर लिख कर मैंने इसे गुरुदेव पंकज जी के सुपुर्द कर दिया. ये ग़ज़ल ठीक होने के बाद आपकी नज़र है.

आदरणीय पंकज जी का बहुत बहुत आभार

उमर की पटरियों पर जिंदगी की रेल है
ये मरना और जीना तो समय का खेल है

नहीं जब तक मेहरबां मौत हम पर तब तलक
हमारी रूह है और जिस्‍म की ये जेल है

रुई का जिस्‍म है मिट जायेगा कुछ देर में
दिये की धड़कनों में जल रहा बस तेल है

रुकेगी सांस जिस पल बंद होंगीं धड़कनें
वही तो आत्‍मा परमात्‍मा का मेल है

तिरा मासूम चे‍हरा जुल्‍फ काली और घनी
के जैसे चांद का संग बादलों के खेल है

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

ग़ज़ल

बहुत दिनों से बहुत से blogs पर ग़ज़ल की तकनीकी जानकारी पढ़ रहा था और कोशिश कर रहा था सीखने की, पर अगर पढ़ कर ही सब जानकारी मिल जाए तो गुरु का महत्त्व नही रहता. फ़िर एक बार पंकज जी ने मेरी ग़ज़ल को पढा और कुछ सुधार बताये उसके बाद वो ग़ज़ल और भी खूबसूरत ही गयी.

पंकज सुबीर जी को मैंने अपनी ये ग़ज़ल भेजी जिसको उन्होंने दुरुस्त किया. शायद उनको मेरी गज़लों में कुछ तो नज़र आया ही होगा जो मेरी ग़ज़लें उनकी नज़रे-करम हुयी. आपके सामने दोनों ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ. पंकज जी का आभारी हूँ जो उन्होंने इस में चार चाँद लगा दिए

मेरी ग़ज़ल

फ़िर जख्म पर मरहम लगाने क्यूँ नही आते
तुम गीत लब से गुनगुनाने क्यूँ नही आते

मैं सितारे आसमाँ से छीन कर ले आउंगा
तुम होंसला मेरा बढ़ाने क्यूँ नही आते

मुद्दतों से ढ़ो रहा हूँ लाश कन्धों पर लिये
तुम गिद्ध हो ये मॉस खाने क्यूँ नही आते

मैं उबलता दूध हूँ गिर जाउंगा कुछ देर में
तुम छींट पानी का लगाने क्यूँ नही आते

मुट्ठियों में बंद है बरसात का बादल मेरी
हिम्मत अगर है घर जलाने क्यूँ नही आते

भीगी हुयी सी रात है महका हुवा है दिन
तुम आँख में सपने सजाने क्यूँ नही आते


पंकज जी द्वारा ठीक करने के बाद वही ग़ज़ल


जख्‍म पर मरहम लगाने क्‍यों नहीं आते
गीत कोई गुनगुनाने क्‍यों नहीं आते

आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

लाश अपनी ढो रहा हूं कब से कांधे पर
गिद्ध हो तुम मांस खाने क्‍यों नहीं आते

मैं उबलता दूध बहने की हदों पर हूं
छींट पानी की लगाने क्‍यों नहीं आते

बंद है मुटृठी में मेरी सावनी बादल
है जो हिम्‍मत घर जलाने क्‍यों नहीं आते

रात भीगी सी है और महका हुआ दिन है
ख्‍वाब आंखों में सजाने क्‍यों नहीं आते

शनिवार, 10 जनवरी 2009

इंकलाबी हो गए

लाल पीले फ़िर गुलाबी हो गए
इश्क मैं हम भी शराबी हो गए

ताश के पत्तों का महल बुन लिया
और फ़िर हम भी नवाबी हो गए

लहू से लिक्खी थी इक ताज़ा ग़ज़ल
कलम से हम इंकलाबी हो गए

जब से तुम ने डायरी में रख लिये
फूल जीते जी किताबी हो गए

हाथ मेरे सर से क्या उसका उठा
शहर में खाना खराबी हो गए

ज़िक्र छेड़ा था अभी उनके सितम का
कहते हैं वो हम हिसाबी हो गए