एक शजर उग आया है उस मिटटी में ...
कह दूंगा जब लौटूंगा इस छुट्टी में.
कितना कुछ लिख पाया ना जो चिठ्ठी में.
बुन लें एक नए ख़्वाबों की हम दुनिया,
राज़ छुपे हैं इतने मन की गुत्थी में.
इश्क़ ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
रात छुपा लाया हूँ अपनी मुठ्ठी में.
लेना देना बातें सब हो जाती थीं,
बचपन की उस बात-बात की कुट्टी में.
बादल का ही दोष हमेशा क्यों हो जब,
चाँद छुपा रहता है अपनी मस्ती में.
इश्क़ हवा में पींगें भरता रहता है,
असर है कितना एक तुम्हारी झप्पी में.
जिस टीले पे वक़्त गुज़ारा करते थे,
एक शजर उग आया है उस मिट्टी में.
आपकी हर ग़ज़ल बस कहर ही ढा देती है ....
जवाब देंहटाएंइश्क़ ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
रात छुपा लाया हूँ अपनी मुट्ठी में.
क्या गज़ब लिखा है ....
जिस टीले पे वक़्त गुज़ारा करते थे,
एक शजर उग आया है उस मिटटी में.
प्रेम की पराकाष्ठा ..... लाजवाब
पहले शेर में छुट्टी लिख लीजिये .....
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (01-12-2021) को चर्चा मंच "दम है तो चर्चा करा के देखो" (चर्चा अंक-4265) पर भी होगी!
जवाब देंहटाएं--
सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
लेना देना बातें सब हो जाती थीं,
जवाब देंहटाएंबचपन की उस बात-बात की कुट्टी में.
वाह ! बचपन की याद ताजा हो गयी, यूँ तो हर शेर ही कोई कहानी छुपाये हैं
क्या बात है सर जी। बहुत शानदार ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंहर शेर लाजवाब, पूरी गजल ही शानदार है । अपने आप में परिपूर्ण रचना । बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको 💐🙏
जवाब देंहटाएंहमेशा की तरह लाजवाब | आभार ब्लॉग पर आ कर टिपण्णी देने के लिए |
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर शानदार गजल
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत मधुर सुन्दर गजल
जवाब देंहटाएंइश्क़ ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
जवाब देंहटाएंरात छुपा लाया हूँ अपनी मुठ्ठी में.---भावों को खूबसूरती
बुन लें एक नए ख़्वाबों की हम दुनिया,
जवाब देंहटाएंराज़ छुपे हैं इतने मन की गुत्थी में.
इश्क़ ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
रात छुपा लाया हूँ अपनी मुठ्ठी में.
इश्क़ हवा में पींगें भरता रहता है,
असर है कितना एक तुम्हारी झप्पी में.
ऐसा लगता है प्यार मोहब्बत अब भी करते पुरी शिद्त और ईमानदारी से ।
प्रेम और स्नेह से लवालव रचना ।
आदरणीय , एक महाशय ने कहा मेरी रचना में कई त्रुटिया है पर उन्होंने बताया नहीं क्या?
कृप्या मेरे पोस्ट पर आयें और अवलोकन कर पूरी ईमानदारी से त्रुटि बतायें ताकि मैं उसमें सुधार कर संक । धन्यवाद !
वाह!लाज़वाब सृजन सर।
जवाब देंहटाएंसादर
आह! यह ग़ज़ल है या कमाल! शायरी के सच्चे शैदाई ऐसी ही ग़ज़लों और नज़्मों की जुस्तुजू में तो रहते हैं।
जवाब देंहटाएंवाह! लावण्य छलक रहा है हर शेर में मासुम सी ग़ज़ल!अहा।
जवाब देंहटाएंवाह! लाजवाब
जवाब देंहटाएंइश्क़ ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
जवाब देंहटाएंरात छुपा लाया हूँ अपनी मुठ्ठी में.
वाह!!!
लेना देना बातें सब हो जाती थीं,
बचपन की उस बात-बात की कुट्टी में.
हर एक शेर बहुत ही कमाल के ....
लाजवाब गजल ।
इश्क ओढ़ कर बाहों में तुम सो जाना,
जवाब देंहटाएंरात छुपा लाया हूँ अपनी मुट्ठी में
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कमाल! कमाल! और बस कमाल लिखा है आपने। आप जैसे शायर को सादर प्रणाम।
बेह्तरीन सृजन
जवाब देंहटाएंबढ़िया प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंशानदार
जवाब देंहटाएंबेहतरीन.... लाज़वाब..., अत्यन्त सुन्दर ।
जवाब देंहटाएंइश्क़ हवा में पींगें भरता रहता है,
जवाब देंहटाएंअसर है कितना एक तुम्हारी झप्पी में.....कुछ अलफ़ाज़ आपको 20 वर्ष पहले की जिंदगी से एकदम से रूबरू करा देते हैं आपके !! बेहतरीन ग़ज़ल
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