स्वप्न मेरे: मगर फिर भी वो इठलाती नहीं है ...

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

मगर फिर भी वो इठलाती नहीं है ...

कोई भी बात उकसाती नहीं है
न जाने क्यों वो इठलाती नहीं है
 
कभी दौड़े थे जिन पगडंडियों पर
हमें किस्मत वहाँ लाती नहीं है

मुझे लौटा दिया सामान सारा
है इक “टैडी” जो लौटाती नहीं है
 
कहाँ अब दम रहा इन बाजुओं में
कमर तेरी भी बलखाती नहीं है
 
नहीं छुपती है च्यूंटी मार कर अब
दबा कर होठ शर्माती नहीं है
 
तुझे पीता हूँ कश के साथ कब से
तू यादों से कभी जाती नहीं है
 
“छपक” “छप” बारिशों की दौड़ अल्हड़
गली में क्यों नज़र आती नहीं है
 
अभी भी ओढ़ती है शाल नीली
मगर फिर भी वो इठलाती नहीं है

29 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, दिगम्बर भाई।

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  2. बहुत खूब..उमर का तकाजा ही होगा वरना ..और तो क्या

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 10 दिसम्बर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. मुझे लौटा दिया सामान सारा
    है इक “टैडी” जो लौटाती नहीं है

    कहाँ अब दम रहा इन बाजुओं में
    कमर तेरी भी बलखाती नहीं है...मनोहारी पंक्तियाँ...।सुंदर अभिव्यक्ति..।

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  5. वाह!दिगंबर जी ,बहुत खूबसूरत भावों से सजी रचना 👌👌

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  6. मुझे लौटा दिया सामान सारा
    है इक “टैडी” जो लौटाती नहीं है
    वाह!!!
    नहीं छुपती है च्यूंटी मार कर अब
    दबा कर होठ शर्माती नहीं है
    क्या बात...
    बहुत ही लाजवाब गजल एक से बढ़कर एक शेर
    वाह वाह...

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  7. वाह!सारे अस्आर लाजवाब अर्थपूर्ण ‌
    बेहतरीन सृजन।

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  8. आदरणीय,

    मेरे ब्लॉग "ग़ज़लयात्रा" में आपका स्वागत है। इसमें आप भी शामिल हैं-

    https://ghazalyatra.blogspot.com/2020/12/blog-post_70.html?m=1

    गंगा | कुछ ग़ज़लें | कुछ शेर | डॉ. वर्षा सिंह
    ग़ज़लों में गंगा की उपस्थिति
    - डॉ. वर्षा सिंह

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  9. समय के साथ सब बदलता चला जाता है लेकिन मन को उसी रवानगी में जीना भाता है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  10. बहुत उम्दा. कितना प्यारा शेर है...

    नहीं छुपती है च्यूंटी मार कर अब
    दबा कर होठ शर्माती नहीं है

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  11. कभी दौड़े थे जिन पगडंडियों पर
    हमें किस्मत वहाँ लाती नहीं है....अगर आप लाख लोगों को चुनें तो वो स्वयं भी ऐसी ही भावनाएं बताएँगे जैसी आपने लिखी हैं।  लेकिन आप भावनाओं को शब्दों में बाँध देते हैं। इसीलिए मैं हमेशा मानता आया हूँ कि आप हर एक व्यक्ति के गजलकार हैं , अद्भुत है आपकी लेखनी 

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  12. बेहतरीन और लाज़वाब..स्मृतियों की धरोहर बड़ी अनूठी होती है । भावपूर्ण सृजन ।

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  13. बहुत सुंदर /लाजवाब ग़ज़ल।
    यादों के कोहरे से लिपटी सी ।

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  14. इस ग़ज़ल में मुझे ५-६ वर्ष पीछे कर दिया है...जब मुझे हर रोज़ आपकी नयी ग़ज़ल का इंतज़ार रहता था.....

    कभी दौड़े थे जिन पगडंडियों पर
    हमें किस्मत वहाँ लाती नहीं है

    ऐसा लगता है ये तो मेरे ह्रदय की ही बात है.

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  15. अभी भी ओढ़ती है शाल नीली
    मगर फिर भी वो इठलाती नहीं ,,,,,,क्या बात है बहुत सुंदर ।

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  16. 224E64170F93
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