जितनी बार भी देश आता हूँ, पुराने घर की गलियों से गुज़रता हूँ, अजीब सा एहसास होता है जो व्यक्त नहीं हो पाता, हाँ कई बार कागज़ पे जरूर उतर आता है ... अब ऐसा भी नहीं है की यहाँ होता हूँ तो वहां की याद नहीं आती ... अभी भारत में हूँ तो ... अब झेलिये इसको भी ...
कुल्लेदार पठानी
पगड़ी, एक पजामा रक्खा है
छड़ी टीक की, गांधी
चश्मा, कोट पुराना रक्खा है
कुछ बचपन की
यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी
के टुकड़े
परछत्ती के
मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है
टूटे घुटने, चलना
मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में
देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है
जाने किस पल छूट
गई थी या मैंने ही छोड़ी थी
बुग्नी जिसमें
पाई, पाई, आना, आना रक्खा है
मुद्दत से मैं
गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है
नींद यकीनन आ
जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में
लिपटा जो एक सिराना रक्खा है
अक्स मेरा भी दिख
जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों
में जिसके एक फ़साना रक्खा है
मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
वाह !बेहतरीन आदरणीय 👌
जवाब देंहटाएंहर बंद में मुस्कुराता, मुद्द्तों से छुपा खजाना गढ़ रखा है..
सादर
आभार अनीता जी ...
हटाएंThis is Very very nice article. Everyone should read. Thanks for sharing. Don't miss WORLD'S BEST
हटाएंCityGtCarStunts
मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
जवाब देंहटाएंपीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है 👌👌👌
बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति, नासवा जी।
बहुत आभार आपका ...
हटाएंमाटी की सोंधी खुशबू से तर-ब-तर...बेहद शानदार गज़ल लिखी है आपने...हर बंध प्रभावशाली है👍👌👌
जवाब देंहटाएंजी सर....अक्षर(फॉण्ट) ज्यादा छोटे है पोस्ट के कृपया अगर संभव हो तो ध्यान दीजिएगा।
जी श्वेता जी ... आभार ध्यान दिलाने के लिए ... बड़ा किया है फॉण्ट को अब ... आभार आपका ...
हटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंfont बहुत छोटे हैं पढने में दिक्कत हो रही है
जी बड़ा किया है फॉण्ट अब ...
हटाएंआपका आभार ...
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-05-2019) को "आसन है अनमोल" (चर्चा अंक- 3335) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आभार शास्त्री जी ...
हटाएंहजूर वैसे तो आँख फाड़ के पढ़ डाली लाजवाब रचना फिर भी थोड़ा फोंट बढ़ा दें तो और आनन्द आये।
जवाब देंहटाएंजी सर फॉण्ट बड़ा किया है ...
हटाएंआपका आभार ...
कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
जवाब देंहटाएंपरछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है....,
लाजवाब...., बेमिसाल..., अत्यन्त सुन्दर ।
आभार मीना जी ...
हटाएंब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 14/05/2019 की बुलेटिन, " भई, ईमेल चेक लियो - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंबहुत आभार शिवम् जी ...
हटाएंपीढ़ी दर पीढ़ी एक जमाना सँभल गयग....
जवाब देंहटाएंवाह!
शुक्रिया वाणी जी ...
हटाएंअक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
जवाब देंहटाएंगहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है...
वाकई मजा आ गया इन लाइनों में । बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय नसवा जी।
आभार आपका पुरुषोत्तम जी ...
हटाएंहम सभी में अतीत के प्रति कुछ न कुछ आसक्ति रहती है लेकिन माँ का प्यार-दुलार अतीतराग में नहीं समाता. यह तो आँखों को नम कर गया-
जवाब देंहटाएंनींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है
जी सच कह रहे हैं आप ...
हटाएंबहुत आभार आपका ...
भावना से ओतप्रोत सुंदर ग़ज़ल ! जाने क्या क्या रखा है पुश्तैनी घर में....बचपन की वो चीजें जिनकी अहमियत किसी खजाने से कम नहीं थी !!! लेकिन सबसे अनमोल यादें तो दादा, दादी, माँ, पिताजी से जुड़ी हुई ही होती हैं। अधिकांश भारतीय कहीं भी रहें अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। यही हमारी ताकत है। खींच लाती हैं यादें वतन की ओर....
जवाब देंहटाएंसहमत आपकी बात से ... बहुत कुछ होता है जो खींचता है अपनी और ... आभार आपका
हटाएंमुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
जवाब देंहटाएंलस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है
बहुत सुंदर यादों से सजी हुई भावपूर्ण प्रस्तुति
बहुत आभार आपका ...
हटाएंकुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
जवाब देंहटाएंपरछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है
मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
क्या कहूं आदरणीय दिगम्बर जी | एक से बढ़कर एक मन को भावुक करने वाले और सजीव चित्र समेटे भावपूर्ण शेर | मिटटी से जुड़े और यादों की गली से गुजरते मन के खूबसूरत एहसासात को बड़ी ही संजीदगी और सुघड़ता से शब्दों में पिरोया है आपने | हिंदी गजल की प्राणवायु दे रहा आपका योगदान अतुलनीय है | सस्नेह और सादर शुभकामनाएं|
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
बहुत आभार रेणु जी 🙏🙏🙏
हटाएंवाआअह क्या खूब लिखा....
जवाब देंहटाएंबहुत आभार शाह नवाज़ जी ...
हटाएंनींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
जवाब देंहटाएंमाँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है
अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है
बहुत सुन्दर ..
शुक्रिया जी
हटाएंवाह !!बहुत खूब दिगंबर जी ,आपने तो हमे भी बचपन का रुख करने को विवश कर दिया ,हर सय आँखो के आगे चलचित्र सा घूमने लगा ,सादर नमस्कार आप को
जवाब देंहटाएंबहुत आभार प्रेरित करने के लिए ...
हटाएंबहुत शानदार प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंशुक्रिया जी ...
हटाएंटेक्स्ट का फॉन्ट बहुत छोटा है। हो सके तो टेक्स्ट के फॉन्ट साइज़ को बढ़ा करें।
जवाब देंहटाएंजी आभार ध्यान दिलाने के लिए ...
हटाएंबहुत शुक्रिया
शानदार और खुबसूरत ग़ज़ल |बधाई
जवाब देंहटाएंशुक्रिया सर बहुत बहुत ...
हटाएंटूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
जवाब देंहटाएंमेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है
ढेर सारी यादों को तरोताजा करने अपने देश आये और बेशकीमती यादों के खजाने को अपने खूबसूरत एवं अद्भुत लेखन के जरिये बाँटते चले गये...बाँटा भी दिल खोलकर...क्या क्या न बाँटा आपने.....बहुत ही भावपूर्ण...
नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है
बहुत ही लाजवाब...
वाह!!!!
आपके मन से लिखे हुए शब्दों का बहुत बहुत आभार
हटाएंभावनाओ को एकतरह से फिर जिन्दा कर दिया आपके शब्दों ने ...शानदार ...साधुवाद ...भगवान् ने आपको जो प्रतिभा दी है ..उसका बेहतरीन उपयोग कर रहे हैं आप ...बुगनी समझ नहीं आया ?
जवाब देंहटाएंआपका प्रेम है योगी जी ...
हटाएंबहुत आभार आपका ...
बेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंआभार आपका ...
हटाएंवाह ! एक तो वैसे ही किसी को बचपन नहीं भूलता और ऐसी यादें बचपन की जो घर के कोने कोने में बिखरी होती हैं, उसे भूलने नहीं देतीं..
जवाब देंहटाएंजी सच कहा है आपने ...
हटाएंबहुत आभार आपका ...
वाह..
जवाब देंहटाएंशुक्रिया विजय जी ...
हटाएंयादों का पिटारा
जवाब देंहटाएंबहुत आभर कविता जी ...
हटाएंमिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
जवाब देंहटाएंपीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है .... वाह ,वाह , बेहतरीन
बहुत आभर आपका ...
हटाएंवाह हर परदेशी का दर्द है। सपने देखता तो है पर पूरा कर नहीं पाता। अदभुत।
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया आपका ...
हटाएंनींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
जवाब देंहटाएंमाँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है
बहुत सुंदर ग़ज़ल आदरणीय
आभार वंदना जी ... अच्छा लगा आपको ब्लॉग पर देख कर ...
हटाएंअसाधारण रचना।
जवाब देंहटाएंयादों का खजाना कितना मोहक कितना दिल के पास अपनी मिट्टी की बौराई खुशबू से कोई जुदा नही हो सकता जड़े सदा खिंच लाती है मिट्टी की तरफ वाह शानदार नासवाजी ।
बहुत आभार आपका ...
हटाएंखूबसूरत रचना। आनंद आ गया।
जवाब देंहटाएंयादों को बाँधकर सजा दिया कोना ,बहुत खूब
जवाब देंहटाएंकुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
जवाब देंहटाएंपरछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है
अनुपम सृजन ...
वाह !!!आदरणीय दिगम्बर जी एक बार फिर आपकी ये रचना पढना
जवाब देंहटाएंनितांत रूहानी अनुभव है | आपकी लेखनी की प्रांजलता आर हो यही दुआ और कामना है |
बहुत आभार आपका रेणु जी ...
हटाएंवाह !!!आदरणीय दिगम्बर जी एक बार फिर आपकी ये रचना पढना
जवाब देंहटाएंनितांत रूहानी अनुभव है | आपकी लेखनी की प्रांजलता अमर हो यही दुआ और कामना है |
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