ज़िन्दगी जो न दिखाए वो कम है ... आस पास बिखरे माहोल से जुड़ा हर पल कालिख की तरफ धकेला जा रहा है ... और धकेलने वाला भी कौन ... इंसान, और वो भी इंसानियत के नाम पर ... पट्टी तो किसी ने नहीं बाँधी आँख पर, फिर भी इंसान है की उसे नज़र नहीं आता ... शायद देखना नहीं चाहता ...
पूछता हूँ देह से परे हर देह से
कि कह सके कोई आँखों से आँखें मिला कर
नहीं जागा शैतान मेरे अन्दर
फिर चाहे काबू पा लिया हो उस पर
चाहता हूँ पूछना जानवर से
जानवर होने की प्रवृति क्या आम है उनमें
या जरूरी है इंसान होना इस काबलियत के लिए
यही सवाल पंछी, कीट पतंगों पेड़ पौधों से भी करता हूँ
कुछ काँटों ने कहा हम नहीं दर्द के व्योपारी
शैतान तो देखा नहीं पर आम चर्चा है कायनात में
है कोई शैतान के नाम से इंसान जैसा
बांटता फिरता है हर दर्द
सुनते हैं इंसान से ऊपर भी रहती है कोई शख्सियत
जिसका प्रचलित नाम खुदा है ... हालांकि लगता नहीं
वैसे तो जंगली गुलाब भी खूब खिलता है यादों में
पर दीखता तो नहीं ...
पूछता हूँ देह से परे हर देह से
कि कह सके कोई आँखों से आँखें मिला कर
नहीं जागा शैतान मेरे अन्दर
फिर चाहे काबू पा लिया हो उस पर
चाहता हूँ पूछना जानवर से
जानवर होने की प्रवृति क्या आम है उनमें
या जरूरी है इंसान होना इस काबलियत के लिए
यही सवाल पंछी, कीट पतंगों पेड़ पौधों से भी करता हूँ
कुछ काँटों ने कहा हम नहीं दर्द के व्योपारी
शैतान तो देखा नहीं पर आम चर्चा है कायनात में
है कोई शैतान के नाम से इंसान जैसा
बांटता फिरता है हर दर्द
सुनते हैं इंसान से ऊपर भी रहती है कोई शख्सियत
जिसका प्रचलित नाम खुदा है ... हालांकि लगता नहीं
वैसे तो जंगली गुलाब भी खूब खिलता है यादों में
पर दीखता तो नहीं ...
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