तेरी चीज़ें सब आपस में बाँट
रहे थे
किसी ने साड़ी उठाई
किसी ने सूट
किसी ने बुँदे, किसी ने
चूड़ी
किसी ने रूमाल, किसी ने चेन
तेरी छोटी छोटी चीज़ों का
भण्डार
मानो खत्म ही नहीं होना
चाहता था
तुमसे बेहतर कौन जानता है
ये चीज़ों की चाह से ज़्यादा
तुझे अपने पास रखने की होड़
थी माँ
तू चुपचाप
दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी
फिर धीरे से पास आकार कान
में बोली
तू कुछ नहीं लेगा ...
मैंने लपक कर तेरी किताबों
का ढेर उठा लिया
अब सोचता हूं तो लगता है
हमेशा से कुछ न कुछ देने की
तेरी आदत
तेरे चले जाने के बाद भी
वैसी ही है ...