कई मित्रों का आग्रह था की गज़ल नहीं लिखी बहुत समय से ... इसलिए प्रस्तुत है एक गज़ल ... विषय तो वही है जिसकी स्मृति हमेशा मन में सहती है ...
सुख दे कर वो दुःख सबके ले
आती है
अम्मा चुपके से सबको सहलाती
है
कर देती है अपने आँचल का
साया
तकलीफों की धूप घनी जब छाती
है
अपना दुःख भी दुःख है, याद
नहीं रखती
सबके दुःख में यूं शामिल हो
जाती है
पहले बापू की पत्नी, फिर
मेरी माँ
अब वो बच्चों की दादी
कहलाती है
सुख, दुःख, छाया, धूप यहीं
है, स्वर्ग यहीं
घर की देहरी से कब बाहर
जाती है
सूना सूना रहता है घर उसके
बिन
घर की हर शै गीत उसी के
गाती है
bahut sundar abhivyaktie- maa k prati prem aur uske samarpan k ehsaas ki!
जवाब देंहटाएंबढ़िया कविता
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंपधारें "आँसुओं के मोती"
बहुत भावप्रवण गज़ल
जवाब देंहटाएंजो होकर भी नजर न आती
जवाब देंहटाएंदूर कहीं न जाती है...वह ही माँ कहलाती है
भाव भीनी गजल..
बहुत सुन्दर भाव !
जवाब देंहटाएंlatest post"मेरे विचार मेरी अनुभूति " ब्लॉग की वर्षगांठ
latest post वासन्ती दुर्गा पूजा
वाह......गहन और सुन्दर।
जवाब देंहटाएंबहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल सुन्दर भाव लिए,आभार.
जवाब देंहटाएंमां पर केंद्रित गजल मां के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति है।
जवाब देंहटाएंदिल को छु लेने वाली प्रस्तुति .... जैसे माँ सामने खड़ी हो गयी हो।
जवाब देंहटाएंmatri sneh ko pradarshi karti behatareen prastuti
जवाब देंहटाएंसूना सूना रहता है घर उसके बिन
जवाब देंहटाएंघर की हर शै गीत उसी के गाती है
भावमय करते शब्द ....
अम्मा चुपके से सबको सहलाती है
जवाब देंहटाएंकर देती है अपने आँचल का साया
तकलीफों की धूप घनी जब छाती है
ye panktiyan bahut khoobsoorat ..
पहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
जवाब देंहटाएंअब वो बच्चों की दादी कहलाती है
सुख, दुःख, छाया, धूप यहीं है, स्वर्ग यहीं
घर की देहरी से कब बाहर जाती है
वाह बहुत खूब .
अपना दुःख भी दुःख है, याद नहीं रखती
जवाब देंहटाएंसबके दुःख में यूं शामिल हो जाती है
पहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
अब वो बच्चों की दादी कहलाती है
वाह, बहुत दिनों बाद की यह गजल वाकई ख़ूबसूरत है, नासवा साहब !
अपना दुःख भी दुःख है, याद नहीं रखती
जवाब देंहटाएंसबके दुःख में यूं शामिल हो जाती है
पहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
अब वो बच्चों की दादी कहलाती है
वाह, बहुत दिनों बाद की यह गजल वाकई ख़ूबसूरत है, नासवा साहब !
पहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
जवाब देंहटाएंअब वो बच्चों की दादी कहलाती है
वाह, बहुत दिनों बाद की यह गजल वाकई ख़ूबसूरत है, नासवा साहब !
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
जवाब देंहटाएंआपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (17-04-2013) के "साहित्य दर्पण " (चर्चा मंच-1210) पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
सूचनार्थ...सादर!
जवाब देंहटाएंगहन अनुभूति
सुंदर रचना
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई
आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
माँ के बारें में तो जितना लिखा जाए कम ही है .
जवाब देंहटाएंअच्छी रचना, लिखते रहिये ..
बहुत भावपूर्ण गजल
जवाब देंहटाएं"कर देती है अपने आँचल का साया
तकलीफों की धुप घनी जब छाती है "
आशा
कुछ भी दुख हो, रह रह कर वही याद आती है।
जवाब देंहटाएंमाँ की यादों पर बेहतरीन ग़ज़ल,आभार.
जवाब देंहटाएंAmma chupke se sabako sahalati hain...Ma to ma hai,usaka sthan bhala kon le sakata hai.aapaki rahana man ko chhu gai,shubhkamnayen
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंAmma chupake se sabako sahlati hain, ma to ma hain koi unaka sthan nahi le sakata.man ko chhu gai aapaki yah behtarin rachana.subhkamnayen.
जवाब देंहटाएंबहुत प्यारी ग़ज़ल....
जवाब देंहटाएंविषय भी इससे प्यारा हो नहीं सकता.
सादर
अनु
aaah ha...........kya bat hai sr waaaaaah waaaaah jitni tarif kru inti km hai waaaaah
जवाब देंहटाएंस्वार्थ नही सन्देह नही ,बस प्यार भरा विश्वास
जवाब देंहटाएंझूठे चेहरों की दुनिया में है एक सच्चाई माँ ।
Behatrin abivykti,subhkamnaye
जवाब देंहटाएंवात्सल्य बोध से लबरेज
जवाब देंहटाएंसूना सूना रहता है घर उसके बिन
जवाब देंहटाएंघर की हर शै गीत उसी के गाती है
..बहुत बढ़िया ... अपनेपन से भीगी सुन्दर प्रस्तुति ...
कर देती है अपने आँचल का साया
जवाब देंहटाएंतकलीफों की धूप घनी जब छाती है
बहुत ही प्यारी सी ग़ज़ल..सच कहा भाव तो वही हैं, विधा कोई भी हो...इतने प्यार से याद करते हैं माँ को, मन भर आता है.
कर देती है अपने आँचल का साया
जवाब देंहटाएंतकलीफों की धूप घनी जब छाती है
bahut sundar ...
बहुत सुंदर ग़ज़ल....!
जवाब देंहटाएंमाँ होती ही ऐसी है...
"एक आँसू भी मेरा जिससे टकराता है पहले..
वो आँचल है तेरा... हर मुसीबत जो मेरी हर ले..."
~सादर!!!
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंवाह !!! बहुत बेहतरीन भावमय सुंदर गजल ,आभार,
जवाब देंहटाएंRECENT POST : क्यूँ चुप हो कुछ बोलो श्वेता.
बहुत ही सुंदर और गहन भाव लिये हुये.
जवाब देंहटाएंरामराम.
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (17-04-2013) के "साहित्य दर्पण " (चर्चा मंच-1210)
पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
सूचनार्थ...सादर!
बेहद प्रभावी...घर की हर शय गीत उसी के गाती है...कण कण में वह मुसकाती है|
जवाब देंहटाएंउनकी उपस्थति हर रूप में बनी रहेगी ..... मन छू गयी रचना
जवाब देंहटाएंह्रदयग्राही रचना.
जवाब देंहटाएंमाँ को हर जगह पाकर भी ढूंढती नज़रें... मन के गहन भाव लिए है ग़ज़ल.बहत उम्दा .
जवाब देंहटाएंसुन्दर भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी. आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें दादा साहेब फाल्के और भारत रत्न :राजनीतिक हस्तक्षेप बंद हो . .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MANजाने संविधान में कैसे है संपत्ति का अधिकार-1
जवाब देंहटाएंसुन्दर अभिव्यक्ति!
जवाब देंहटाएंbahut sunder prastuti badhai
जवाब देंहटाएंrachana
गजल या कविता..ज्यादा समझ नहीं..पर भाव के साथ इतने प्यार से आप लिखते हैं कि पूरी पढ़े बिना नहीं रहा जाता...
जवाब देंहटाएंमाँ को इससे ज्यादह और कैसे परिभाषित कर सकते हैं ! बहुत ही सुंदर रचना ! अपनी माँ की यादें ताज़ा हो गयीं !
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर गजल नासवा जी,
जवाब देंहटाएंबड़े दिनों बाद पढने को मिली ...आभार !
अपना दुःख भी दुःख है, याद नहीं रखती
जवाब देंहटाएंसबके दुःख में यूं शामिल हो जाती है
ग़ज़ल माँ को पास ले गयी. कुछ और नहीं कह सकता इस ग़ज़ल के बारे में .
बढ़िया है आदरणीय -
जवाब देंहटाएंशुभकामनायें-
ममतामयी गज़ल!!
जवाब देंहटाएंआकाश को कागज करूँ, सभी तरूवर को कलम, सभी सागर की रोशनाई करूँ फिर भी माँ की ममता कही न जाय!!
बहुत भावमयी ग़ज़ल...दिल को छू जाती है...
जवाब देंहटाएंग़ज़ल भी उतनी ही भावमयी.
जवाब देंहटाएंवाह क्या बात है! बहुत सुन्दर!
जवाब देंहटाएंपहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
जवाब देंहटाएंअब वो बच्चों की दादी कहलाती है
नारी तेरी बस यही कहानी.
वाह! बेहद उम्दा रचना |
जवाब देंहटाएंकभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page
जवाब देंहटाएंसूना सूना रहता है घर उसके बिन
घर की हर शै गीत उसी के गाती है
अम्म जब तब मन को यूं सहलाती है ....भाव शान्ति करती रचना .
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल नासवा साहेब,
जवाब देंहटाएंदो पंक्तियाँ मेरी तरफ से भी समर्पित हैं माँ के नाम :
जाड़े में वो धुप सरीखी, गर्मी में है छाया सी
पतझड़ में खुशबू बन वो, जीवन में समाती है
'अदा'
जवाब देंहटाएंइस स्वर्ग से वंचित होना बेहद दुखद है। सदा की तरह गहरे भाव लिए कविता
बेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंगीत उसी के गाती है
जवाब देंहटाएंकितने रूप बदलती है जिंदगी , मगर माँ ही है , जो हमेशा माँ रहती है !
जवाब देंहटाएंसोचती हूँ अक्सर उन बदनसीबों को जिनकी माँ ऐसी नहीं होती !
बहुत बढ़िया !
एक रचना मैंने लिखी थी -
जवाब देंहटाएंअंधियारी काली रातों में
जैसे जलता एक दीया
ऐसी थी मेरी अम्मा।
सूना सूना रहता है घर उसके बिन
जवाब देंहटाएंघर की हर शै गीत उसी के गाती है
अभी हाल ही में फेस बुक में कहीं पढ़ा ''इंसान अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलता फिर माँ का प्यार क्यों भूल जाता है ?'' पर आपके लिए ये बात लागु नहीं होती ..अपनी तमाम जिम्मेदारियों के बीच भी माँ को याद करना और उसे सम्मान देना बहुत बड़ी बात है ....
बधाई ...!!
सच कहा आपने
जवाब देंहटाएंघर की हर शै गीत उसी के गाती है
माँ की छाया जिस गजल में हो वो तो ऐसे ही बहुत सुंदर हो जाती है
सादर आभार !
माँ बहुत से जीवन जीती है, बहुत भावप्रवण गज़ल
जवाब देंहटाएंdil ki peer .....bhawnaon ka samandar ..very touching...
जवाब देंहटाएंBhaav vibhor karne vaali sundar gazal.
जवाब देंहटाएं"घर की हर शै गीत उसी के गाती है"
जवाब देंहटाएंसादर
माँ तू बहुत याद ही आती है...
जवाब देंहटाएंह्रदय स्पर्शी भाव ... शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंविचलित होता मीत मेरा मन ,
माँ बन छाया चुपके से आ जाती है .
DIGAMBAR JI , SABHEE PANKTIYAAN
जवाब देंहटाएंBEHTREEN HAIN . MAA KO AAPNE KHOOB
YAAD KIYAA HAI .
मन के उद्गारों की प्रभावी अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंयूरिक एसिड कम करने के लिए खुराक में प्रोटीन कम करें हरी तरकारी बढ़ा दें ,पनीर ,चीज़ ,नान वेज न लें .टमाटर ,पालक ,छाछ (दही,बटर )भी न लें .
जवाब देंहटाएंअपनी उपलब्धि पर हम इतराते हैं,
जवाब देंहटाएंअम्मा बस चुपके-चुपके मुस्काती है!
इस विषय पर आपने भी कई बार लिखा है और जब भी लिखा है, रुलाया है!!
सूना सूना रहता है घर उसके बिन
जवाब देंहटाएंघर की हर शै गीत उसी के गाती है.
माँ आखिर माँ है. मार्मिक प्रस्तुति.
माँ तो बस....माँ है....
जवाब देंहटाएंसारी कायनात फीकी उससके आगे.....
क्या बात है सर जी.....!
जवाब देंहटाएंबहुत खूब!
कर देती है अपने आँचल का साया
जवाब देंहटाएंतकलीफों की धूप घनी जब छाती है||
क्या खूब कहा है साहब.. ! ये छाँव तो वरदान है इंसान पर !
पढ़कर मुनव्वर राणा की याद आ गई। बेहतरीन, लाजवाब!!
जवाब देंहटाएंshradha bhav jagaati hui bahut sunder rachana.
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया.ह्रदय स्पर्शी भाव .सुन्दर प्रस्तुति..
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत भावपूर्ण एवं सुन्दर गजल .
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंबहुत खूब..
जवाब देंहटाएंअपना दुःख भी दुःख है, याद नहीं रखती
जवाब देंहटाएंसबके दुःख में यूं शामिल हो जाती है
मन से उपजी हुई मार्मिक गज़ल.....
Bahut Sundar...
जवाब देंहटाएंवाह..चारो के चारो पोस्ट बहुत सुन्दर हैं...माँ पर लिखे चारो पोस्ट !!
जवाब देंहटाएं
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