स्वप्न मेरे: चार कांधों की जरूरत है जरा उठना ...

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

चार कांधों की जरूरत है जरा उठना ...

प्रस्तुत है आज एक ग़ज़ल गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से सजी ....


छोड़ कर खुशियों के नगमें दर्द क्या रखना
लुट गया मैं लुट गया ये राग क्या् जपना

मुस्कुारा कर उठ गया सोते से मैं फिर कल
याद आई थी किसी की या के था सपना

कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना

याद पुरखों की है आई आज जब देखा
घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
याद मुझको आ गया अखबार का छपना

आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

81 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    वाह बहुत सुन्दर गजल ... बधाई...

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  2. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना
    waah

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  3. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना

    याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    वाह ..बहुत खूबसूरत गज़ल ..

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  4. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ !

    जवाब देंहटाएं
  5. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना
    याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    बहुत सुन्दर गजल...

    जवाब देंहटाएं
  6. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना

    आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    उफ़ ! क्या गज़ल है ……………बेहद शानदार , लाजवाब्।

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  7. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना
    --
    बहुत ही प्रभावशाली गजल है!
    --
    आपकी कलम को नमन!
    पंकज गुरूदेव को प्रणाम!
    --
    13 अक्टूबर के चर्चामंच पर इसकी चर्चा है ना!
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    नतमस्तक हूँ इस रचना के आगे
    आभार आपका इस रचना के लिए

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  9. शुरूआती लाइंस में कुछ टाइपिंग मिस्टेक सा है जो ध्यान बंटा रहा है
    कृपया इसका उचित समाधान करें

    [इस कमेन्ट को हटा सकते हैं ]

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  10. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना
    " बेहद सुन्दर ग़ज़ल है, किसी शेर में कसक है, कहीं एहसास की महक, तो कही पुरखों की याद, आखिरी शेर में कोई लावारिस दर्द ही उभर आया है...."
    regards

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  11. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना ..

    very touching.

    .

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  12. धरा से जुडी , मार्मिक रचना । बहुत खूब ।

    जवाब देंहटाएं
  13. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना

    लाजबाब ...बहुत ही बढ़िया.

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  14. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना


    बेहतरीन ग़ज़ल| मकता कमाल का है .......दिल से मुबारकबाद|

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  15. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना



    मार्मिक.........
    भावपूर्ण........

    बढिया लिखा है साहिब.

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  16. झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    यह शेर पसन्द आया. आप बहुत मन से रचनाए‍ लिखते है‍.

    जवाब देंहटाएं
  17. बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  18. झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    वाह वाह बहुत खूब ...बहुत सुन्दर सच्ची बात लिखी आपने ..बहुत पसंद आया यह शेर

    जवाब देंहटाएं
  19. बहुत अच्छी गज़ल है..बधाई.
    मक्ते का यह शेर तो हिला के रख देता है..

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

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  20. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना
    क्या कहूँ बस लाजवाब...

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  21. आदरणीय बंधुवर दिगम्बर नासवा जी
    नमस्कार !
    शुक्रिया ! करम ! मेहरबानी !
    मेरे आग्रह की रक्षा के लिए …
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल का तोहफ़ा क़बूल है जनाब !

    मुस्कुरा कर उठ गया सोते से मैं फिर कल
    याद आई थी किसी की या के था सपना

    …देख लीजिए , वो कहते हैं न -"इस दिल से तेरी याद भुलाई नहीं जाती …"

    झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    वाह हुज़ूर वाह !

    एक शे'र मुलाहिजा फ़रमाएं -
    शख़्स बड़ा बेकार है वो
    बिल्कुल इक अख़बार है वो

    हा हाऽऽ हाऽऽऽ ठीक कहा न ? :)

    आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    कोई जवाब नहीं इस शे'र का … यानी लाजव्व्वाब शे'र !!

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की ज़रूरत है ज़रा उठना

    संवेदनहीनता की पराकाष्ठा के बीच जागी हुई इंसानियत का चित्रण
    सोचने को विवश कर रहा है …
    बहुत गंभीर विषय पर ला'कर ग़ज़ल सौंप दी आपने तो …

    पूरी ग़ज़ल प्रवहमान !
    बह्र का शानदार निर्वहन !
    रवायत और ज़दीदियत के रंग लिए जानदार कहन !
    एक मुकम्मल ख़ूबसूरत ग़ज़ल और किसे कहते हैं … ?
    कोई उस्ताद ( फ़र्ज़ी नहीं असली वाला :) ) मिला तो पूछ कर बताऊंगा

    बहुत बहुत शु्भकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  22. aadrniy sir ,
    aapki is gazal ki jitni bhi taarrif ki jaaye vo bahut hi kam padegi.
    saari -ki saari gazal hi dil ko chhoo gai------
    याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना
    bahut bahut aabhar is behatreen gazal ke liye.
    poonam

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  23. वाह दिगंबर जी क्या कहूं आपकी इस रचना ने शब्दों की कमी कर दी है मेरे पास |
    awesome..

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  24. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

    इस के बाद कुछ बाकी नहीं रह जाता कहने को

    सुंदर उम्दा गज़ल.

    जवाब देंहटाएं
  25. छोड़ कर खुशियों के नगमें दर्द क्या रखना
    लुट गया मैं लुट गया ये राग क्या् जपना
    सही मश्वरा...आगे बढ़ा जाए..
    कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना...
    कमाल का शेर है...वाह...
    आपके कलाम को पढ़कर अलग ही अनुभूति होती है.

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  26. क्या बात है नासवा साहब ... बेहतरीन शेर कहे हैं ! बधाई !!

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  27. पहली बार ग़ज़ल देखी आपके ब्लॉग पर... और विश्वास कीजिए,आपकी कविता की गहराई इस ग़ज़ल में भी दिखती है!!मैं किसी एक शेर की तारीफ नहीं कर सकता.. क्योंकि सभी लाजवाब हैं!

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  28. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

    अहा इन दोनों शे'रों का क्या कहना बहुत बढ़िया साब , क्या शे'र गढ़े हैं आपने... दिली दाद कुबूल करें ...


    अर्श

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  29. याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    बहुत ही ज़मीन से जुड़े ख़यालात वाली रचना ......

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  30. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना


    -गजब कर डाला..हर शेर ऊँचाई पर...वाह!

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  31. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना
    बहुत सुन्दर .. हर शेर लाजवाब

    जवाब देंहटाएं
  32. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

    क्या बात कही है!

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  33. याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    ये शेर इस बात का सुबूत है कि आप अपनी धरती से कितना जुड़े हुए हैं
    बहुत बढ़िया !

    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

    मार्मिक चित्रण

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  34. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना
    याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना
    बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां, भावमय करती हुई ।

    जवाब देंहटाएं
  35. बहुत ही भावपूर्ण गजल ... अच्छी प्रस्तुति.


    .

    www.srijanshikhar.blogspot.com पर " क्योँ जिँदा हो रावण "

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  36. झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना ; बहुत खूब एक ऐसा विडियो जिसे सबको देखना चहिये है? अगर हां तो बताएं अवश्य..

    जवाब देंहटाएं
  37. कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना

    क्या बात है...बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  38. याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना
    वाह क्या खूबसूरत शेर निकाले हैं। आपकी कलम हो और पंकज जी का आशीर्वाद हो फिर भला गजल कैसे अच्छी नही निकलेगी । बधाई आपको।

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  39. 'झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना
    *****वाह ! वाह! एक नया ख्याल..बहुत खूब!

    ******बहुत अच्छी ग़ज़ल है.

    जवाब देंहटाएं
  40. बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!

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  41. याद पुरखों की है आई आज जब देखा
    घर के इस तंदूर में यूं रोटियां थपना

    Beautiful !

    .

    जवाब देंहटाएं
  42. शिखा वार्ष्णेय और रश्मि रविजा जी के साथ अ़पनी भी सहमति !

    जवाब देंहटाएं
  43. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    दिगंबर जी, ग़ज़ल कुछ दिन बाद पढ़ने को मिली पर मिली तो बेहतरीन....पिछले कुछ दिनों से आपके छ्न्दमुक्त कविताओं में खो गया ..आज इस ग़ज़ल पर निशब्द हूँ..बेहतरें भाव को समेटे एक सुंदर ग़ज़ल....बधाई स्वीकारें

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  44. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    behatarin ..gazal dil ko chu gayi

    ------ eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  45. वाह, नासवाजी..। बेहतरीन गज़ल। गुरुवर के आशीर्वाद से निकली यह किसी भगीरथी से कम नहीं है..।

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  46. छोड़ कर खुशियों के नगमें दर्द क्या रखना
    लुट गया मैं लुट गया ये राग क्या् जपना !
    - जनमन उपयोगी !
    पुरखों की याद का इस तरह जागना ही आज का सच हो गया है !

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  47. बहुत ही खूबसूरत गज़ल !
    हर शेर बहुत ही उम्दा !

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  48. बहुत ही सुन्दर क्षणिकाएँ. सम्वेदना से परिपूर्ण.

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  49. लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना

    is aakhri band ne kamaal kar diya

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  50. निहायत ही प्यारी और खूबसूरती से गाये जाने लायक गज़ल लगी..भीगा-भीगा सा टाइटिल ही मोह लेता है..मगर यह शेर तो और भी कातिल है

    झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    बहुत सुंदर!

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  51. निहायत ही प्यारी और खूबसूरती से गाये जाने लायक गज़ल लगी..भीगा-भीगा सा टाइटिल ही मोह लेता है..मगर यह शेर तो और भी कातिल है

    झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    बहुत सुंदर!

    जवाब देंहटाएं
  52. गहरा असर छोड़ा इस रचना ने .बधाई.

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  53. झूठ भी तुम इस कदर सच्चाई से बोले
    याद मुझको आ गया अखबार का छपना

    बढ़िया लगी ग़ज़ल..........के हर शेर.........

    हार्दिक बधाई...

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  54. भई वाह क्या बात है ....बहुत ही सुंदर ...

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  55. क्या कह जाते हैं आप.....
    अब क्या कहूँ.......

    ईश्वर आपके कलम को इसी तरह प्रखरता दें..

    जवाब देंहटाएं
  56. वाह खूब लिखते हैं आप दशैहरे की शुभकामनायें .

    जवाब देंहटाएं
  57. आपकी आंखों की मिट्टी में न जम जाएं
    जल रहे हैं ख्वाब इनके पास मत रुकना

    sundar gazal !

    .

    जवाब देंहटाएं
  58. बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता ,एक भाव और लय लिए हुए ।

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  59. मुस्कुारा कर उठ गया सोते से मैं फिर कल
    याद आई थी किसी की या के था सपना
    ...........................
    लाजवाब !!!!

    जवाब देंहटाएं
  60. nawasha ji ye guru dev Pankaj ji kon hai
    bahut hi sungdar rachnayen hai padh kar apar aanand aaya

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  61. हर शेर अच्छा है ,कुछ बहुत अच्छे.

    'छोड़ कर खुशियों के नगमें दर्द क्या रखना
    लुट गया मैं लुट गया ये राग क्या् जपना ' अरे यही तो मेरा फलसफा है जीने का और सबका होना चाहिए.

    'कल सुबह देखा पुराना ट्रंक जब मैंने
    यूं लगा जैसे के कोई छू गया अपना ' येस बहुत भावुक कर देते हैं ये बंद ट्रंक/ बक्से...जब भी खोलते हैं यादें...किसी का जुड़ाव...किसी के करीब होने का अहसास देते हैं ये.कुछ पुराने फोटो..या...माँ की पुरानी साड़ी.सचमुच के ट्रंक...यादोँ के ट्रंक. भावुक कर देते हो दुष्ट ! मुझे बार बार.गजब लिखते हो.कोई छल कपट...शब्दों का खेल नही यहाँ.एकदम सच्चे भान,भावनाये.
    और.............'
    लाश लावारिस पड़ी है चौक पर कोई
    चार कांधों की जरूरत है जरा उठना' ????क्या लिखूं??? तुम ही बताओ बेटा!
    'चार कांधों की जरूरत है जरा उठना'

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  62. Besuchen Sie https://csvisor.de um sich mit den aktuellen Anforderungen für KRITIS und B3S im Krankenhaus-IT-Bereich vertraut zu machen. Die neuen Vorgaben der BSI TR-03116 verlangen, dass IT-Systeme in kritischen Infrastrukturen regelmäßig auf Sicherheitslücken geprüft werden. Für 2024 sind speziell die Schwachstellen in medizinischen Geräten und Servern der Klassifizierung nach §8 Absatz 1 des IT-Sicherheitsgesetzes relevant, welche bei unzureichender Absicherung massive Folgen haben können.

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